भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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३२८सिद्धान्तलेशसंग्रह[ द्वितीय परिच्छेद

तावद् दुर्वारम् । उपाधिप्रतिहतनयनरश्मीनां प्रतिनिवृत्तिनियमं विहाय यत्र बिम्बं तत्रैव गमनोपगमात् । तथा मलिनदर्पणे श्यामतया गौरमुखप्रतिबिम्बस्थले विद्यमानस्यापि बिम्बगतगौररूपस्य चाक्षुषज्ञानेऽनुपयोगितया पीतशङ्खभ्रमन्यायेनारोप्यरूपवैशिष्टयेनैव बिम्बमुखस्य चाक्षुषत्वं निर्वाह्यमिति, तथैव नीरूपस्यापि दर्पणोपाधिश्यामलत्ववैशिष्ट्येन चाक्षुषप्रतिबिम्बभ्रमविषयत्वमपि दुर्वारम् । स्वतो नीरूपस्यापि नभसोऽध्यस्तनैल्यवैशिष्ट्येन

चाहिए, क्योंकि उपाधिसे प्रतिहत नेत्ररश्मियोंके प्रतिनिवृत्तिनियमका † परित्याग करके जहाँ बिम्ब हो, वहीं गमनका उपगम है । तथा इसी प्रकारसे ‡ मलिन दर्पणमें गौरमुखके प्रतिबिम्बित होनेपर उस प्रतिबिम्बका श्यामरूपसे भान होता है, गौर रूपसे नहीं, इससे बिम्बमें गौर रूपके रहनेपर भी उसका चाक्षुष ज्ञानमें उपयोग न होनेसे पीतशङ्खभ्रमन्यायसे * आरोपित रूपके सम्बन्धसे ही बिम्बकी चाक्षुषताका निर्वाह करना चाहिए, इस अवस्थामें नीरूप आकाश आदिका भी दर्पण आदिके श्यामत्व सम्बन्धसे चाक्षुषप्रतिबिम्बभ्रम हो सकता है, क्योंकि † आकाशके स्वतः नीरूप होनेपर भी अध्यस्त नैल्यके


† प्रतिनिवृत्तिनियम—नेत्रगोलकके अभिमुख विषयसे आहत रश्मियाँ फिर गोलकके द्वारा शरीरके भीतर जाती हैं, इस प्रकारका नियम ।

‡ उपाधिप्रतिहत नयनरश्मियोंके प्रतिनिवृत्तिनियमाभाव पक्षमें पृष्ठभागव्यवहित प्रतिबिम्बकी आपत्ति हो सकती है, वैसे ही नीरूप वायुका भी चाक्षुष प्रतिबिम्ब प्रसक्त हो सकता है, इस प्रकार दूषणान्तरके समुच्चयके लिये तथा शब्द है ।

* कवितार्किकमतके उपपादनके अवसरमें शंखका आरोप्य पीतरूपके सम्बन्धसे ही भ्रम हो सकता है, अन्यथा नहीं, यह कहा जा चुका है, इसी पीतशङ्खन्यायसे, यह भाव है ।

वस्तुतस्तु 'द्रव्यके चाक्षुष प्रत्यक्षमें द्रव्यगत उद्भूतरूप ही कारण है' इस नियमके विद्यमान होनेसे नीरूप द्रव्यका चाक्षुष प्रतिबिम्ब—भ्रम हो ही नहीं सकता है। मलिन दर्पणमें गौर मुखके प्रतिबिम्ब भ्रमस्थलमें और पीतशङ्ख आदि भ्रमस्थलमें 'श्याम मुख' और 'पीतशङ्ख' इस प्रकारके भ्रमके पूर्वमें अध्यासके प्रति कारणभूत धर्मिज्ञानमें गौर और शुक्ल आदि कारण होनेसे उपयोगके अभावकी सिद्धि नहीं हो सकती है, अर्थात् बिम्बगत गौर रूप आदिकी उपयोगिता धर्मिज्ञानके लिए अवश्य है । द्रव्य चाक्षुषमें रूपविषयकत्वनियमाभाव कवितार्किकके मतमें दिखलाया भी जा चुका है ।

† कवितार्किकमतसे ही आरोप्यरूपविशिष्टत्वेन आकाशका चाक्षुष ज्ञान माना जाता हैं, वस्तुतस्तु अन्य पूर्वाचार्योंको यह स्वीकृत नहीं है, उनके मतसे गगनमें समन्ताद् व्याप्त

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