सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 363, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रतिबिम्बकी सत्यताका निराकरण-विचार] भाषानुवादसहित ३३३
तदवयवावस्थानाविरोधेन तादृक्प्रतिबिम्बोत्पादनसमर्थं च किञ्चित् कारणं कल्प्यम्' इति । तर्हि शुक्तिरजतमपि सत्यमस्तु । तत्रापि शुक्तौ यथापूर्वं स्थितायामेव तत्तादात्म्यापन्नरजतोत्पादनसमर्थं किञ्चित्कारणं परिकल्प्य तस्य रजतस्य दोषत्वाभिमतकारणसहकृतेन्द्रियग्राह्यत्वनियमवर्णनोपपत्तेः किं 'शुक्तिरजतमसत्यम्, प्रतिबिम्बः सत्यः' इत्यर्धजरतीयन्यायेन । न च तथा सति 'रजतम्' इति दृश्यमानायाः शुक्तेरग्नौ प्रक्षेपे रजतवद् द्रवीभा-
स्थिति पूर्ववत् ही रहे, इसलिए उनका अविरोधी तथा उस प्रतिबिम्बके उत्पादनमें समर्थ किसी कारण द्रव्यकी भी कल्पना करनी चाहिए* । इसलिए प्रतिबिम्बके द्रव्यान्तर और सत्य होनेमें कोई विरोध नहीं है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि इस युक्तिसे शुक्तिरजत भी सत्य हो जायगा । अर्थात् शुक्ति-रजतमें भी यथापूर्व अवस्थित शुक्तिमें ही शुक्तितादात्म्यापन्न रजतके उत्पादनमें समर्थ किसी कारणविशेषकी कल्पना करके उस रजतमें दोषत्वसे अभिमत कारण† सहकृत इन्द्रियग्राह्यत्वं नियमको मानकर उपपत्ति हो सकती है फिर 'शुक्तिरजत असत्य है' और प्रतिबिम्ब सत्य है ? इस अर्धजरतीयन्यायके ‡ अङ्गीकारका प्रयोजन ही क्या है ? यदि शङ्का हो कि शुक्तिरजतको सत्य नहीं मान सकते हैं, कारण कि उनके सत्य होनेपर रजतरूपसे देखी गई शुक्ति का अग्निमें प्रक्षेप करनेपर रजतके समान द्रवीभावकी आपत्ति होगी, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि अग्नि और कस्तूरीके प्रतिबिम्बमें जैसे उष्णता और
* जैसे नीवारके अवयवोंमें व्रीहीके अवयव मीमांसकोंने माने हैं, वैसे ही दर्पणके अवयवोंमें संयुक्त प्रतिबिम्बके अवयवोंकी भी कल्पना करनी चाहिए, यह तात्पर्य है। यहाँ शङ्का करनेवालेका भाव यह है कि प्रतिबिम्ब स्वयं सत्य है और उसमें प्रतीयमान धर्म असत्य हैं।
† यदि शुक्तिरजत सत्य माना जायगा तो उसका अस्तित्व सदा शुक्तिमें होनेके कारण शुक्ति-प्रत्यक्षकालमें भी रजतका प्रत्यक्ष होना चाहिए, इस शङ्काका इस नियमसे परिहार किया गया अर्थात् शुक्तिमें रजतके होनेपर भी उसका प्रत्यक्ष तभी होगा जब इन्द्रिय दोषसहकृत होगी, अतः पूर्वोक्त दोष नहीं आ सकता है, यह भाव है।
‡ जरती—वृद्धा, उसके आधे हिस्सेकी मुख आदिकी अभिलाषा करना और अवशिष्ट भागकी इच्छा नहीं करना, इसमें कोई युक्ति नहीं है, वैसे प्रकृतमें शुक्तिरजतको मिथ्या मानना और प्रतिबिम्बको सत्य मानना, युक्तिविधुर है।