भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

पृष्ठ 369, कुल 590 में से

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प्रतिबिम्बकी सत्यताका निराकरण-विचार] भाषानुवादसहित ३३९


प्रतिबिम्बाध्यासविरोधिविषयकतायाऽधिष्ठानयाथात्म्यज्ञानस्य प्रतिबन्धकविरहसचिवस्य तन्निवर्तकत्वोपपत्तेः । अवस्थाऽज्ञानोपादानत्वपक्षेऽपि तस्य प्राचीनाधिष्ठानज्ञाननिवर्तितावरणशक्तिकस्य समानविषयत्वभङ्गेन प्रतिबन्धकाभावकालीनाधिष्ठानज्ञानेन निवर्तयितुमशक्यतया प्रतिबिम्बाध्यासमात्रस्यैव तन्निवर्त्यत्वस्योपेयत्वात् । अथवा स्त्रोपादानाज्ञाननिवर्तकब्रह्मज्ञान-


जिसका, ऐसे प्रतिबिम्बाध्यासके प्रति विरोधिविषयक होनेसे—'दर्पणमें मुख नहीं है, इत्यादिरूप अधिष्ठानयथार्थज्ञानके अभावविषयक होनेसे—प्रतिबन्धक ( उक्त सन्निधान ) की निवृत्तिसहकृत अधिष्ठानयथार्थज्ञान मूलाज्ञानका निवर्तक हो सकता है । जो लोग अवस्थारूप अज्ञानको प्रतिबिम्बाध्यासका उपादान मानते हैं, उनके पक्षमें भी * अवस्थारूप अज्ञानके, जिसकी कि आवरणशक्ति 'दर्पणमें मुख नहीं है' इस प्रकारके प्रतिबिम्बाध्यासके प्राक्तन अधिष्ठानसाक्षात्कारसे निवृत्त हो गई है, † समानविषयत्वका भङ्ग होनेसे बिम्ब और उपाधिकी सन्निधिरूप प्रतिबन्धकके अभावकालीन अधिष्ठानज्ञानसे उस अवस्थारूप अज्ञानकी निवृत्ति नहीं कर सकते हैं, अतः प्रतिबिम्बाध्यासमात्र ही अधिष्ठानसाक्षात्कारसे निवृत्त होता है, ऐसा माना गया है। ‡ अथवा प्रतिबिम्बाध्यासके प्रति उपादानभूत अज्ञानके निवर्तक ब्रह्मज्ञानसे


* जिस पक्षमें प्रतिबिम्बाध्यासको अवस्थारूप अज्ञानसे जन्य मानते हैं, उस पक्षमें भी बिम्ब और उपाधिके सान्निध्यकी निवृत्तिसे युक्त अधिष्ठानसाक्षात्कार ही उस अध्यासके उपादानका ( अज्ञानका ) निवर्तक होता है, यह मानना होगा, इसीसे ज्ञान अज्ञानका ही निवर्तक है और अज्ञानका कार्य तो उपादानकी निवृत्तिसे निवृत्त होता है, इस प्रकारका पञ्चपादिकाकारका वचन सार्थक होता है, इस प्रकार आशङ्का करके अवस्थारूप अज्ञानके उपादानत्वपक्षसे प्रतिबिम्बाध्यासकी निवृत्तिका प्रकार बतलाते हैं, यह भाव है ।

† आवरणके विनष्ट होनेपर दर्पणाद्यवच्छिन्न चैतन्य अवस्थारूप अज्ञानका विषय नहीं हो सकता है, अतः अधिष्ठानज्ञान अवस्थारूप अज्ञानका समानविषयक नहीं होगा, इस परिस्थितिमें उनका परस्पर निवर्त्य-निवर्तकभाव नहीं हो सकता है, केवल प्रतिबिम्बाध्यासमात्रकी ही निवृत्ति ज्ञान करता है, यह अवस्थारूप अज्ञानके प्रतिबिम्बाध्यासोपादानत्वपक्षमें मानना होगा, यह भाव है।

‡ उक्त पक्षके अनुसार निवर्त्यनिवर्तकभावकी उपपत्ति करनेपर भी 'ज्ञान अज्ञानका ही निवर्तक है, इस पञ्चपादिकाकारके वचनके साथ अविरोध नहीं होता है, अतः 'अथवा' पक्ष है ।