भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

पृष्ठ 385, कुल 590 में से

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पृष्ठ 385

स्वाप्नं पदार्थोंके अनुभव-प्रकारका विचार] भाषानुवादसहित ३५५


इव गजाद्यनुभवस्य चक्षुरुन्मीलनाद्यनुविधानं प्रतीयते इति चेत्, 'चक्षुषा रजतादिकं पश्यामि'इत्यनुभवोदयमपि कश्चित् स्वप्नभ्रमो भविष्यति यत् केवलसाक्षिरूपे स्वाप्नगजाद्यनुभवे चक्षुराद्यनुविधानं तदनुविधायिनी वृत्तिर्वाऽध्यस्यते । किमिव हि दुर्घटमपि भ्रमं माया न करोति विशेषतो निद्रारूपेण परिणता, यस्या माहात्म्यात् स्वप्ने रथः प्रतीतः क्षणेन मनुष्यः प्रतीयते, स च क्षणेन मार्जारः । स्वप्नद्रष्टुश्च न पूर्वापरविरोधानुसन्धानम्। तस्मादन्वयाद्यनुविधानप्रतीतितौल्येऽपि जाग्रद्गजाद्यनुभव एव चक्षुरादि-जन्यः, न स्वाप्नगजाद्यनुभवः ॥ .

दृष्टिसृष्टिविदस्त्वाहुर्गतिं जाग्रद्धियोऽप्यमूं ॥
अर्थसृष्टेः पुराऽर्थेषु सन्निकर्षादिसम्भवात् ॥४०॥

दृष्टिसृष्टिवादियोंका कहना है कि जाग्रत्कालीन घटादिके ज्ञानोंकी भी स्वप्नकालीन पदार्थोंके ज्ञानोंकी नाई ही गति है, क्योंकि अर्थदृष्टिके पूर्वमें अर्थोंमें इन्द्रियोंका सन्निकर्ष नहीं है ॥४०॥


नहीं होता है, इसलिए जाग्रत् गज आदिके अनुभवके समान चक्षुरुन्मीलनके साथ अन्वय-व्यतिरेक देखा जाता है, अतः स्वाप्न पदार्थोंके चाक्षुषत्वानुभवको भ्रमात्मक कैसे मान सकते हैं ? तो यह भी शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि 'चक्षुसे रजत आदि देखता हूँ' इस भ्रमात्मक अनुभवके समान यह भी कोई स्वप्नभ्रम होगा, जो कि केवल साक्षीरूप स्वाप्नगज आदिके अनुभवमें चक्षु आदिका अन्वयव्यतिरेक या चक्षु आदिके अन्वय-व्यतिरेकसे युक्त मानसवृत्ति ( अर्थात् पूर्वमें कल्पतरुके वचनके अनुसार कल्पित स्वाप्न प्रपञ्चगोचर मानसवृत्तिमें चक्षु आदिका अनुविधान ) अध्यस्त होती है । क्योंकि ऐसा कौन दुर्घट भ्रमरूप कार्य है जिसे माया नहीं कर सकती हो, वहाँपर भी विशेषतः निद्रारूपसे परिणत माया तो सभी कुछ कर सकती है । कारण कि निद्रारूपसे परिणत जिस मायाके प्रभावसे स्वप्नमें रथरूपसे देखा गया पदार्थ क्षणमें मनुष्य बन जाता है, वही एक क्षणमें बिल्ली प्रतीत होता है और स्वप्नके द्रष्टाको पूर्वापरके विरोधकी भी प्रतीति नहीं होती है । इसलिए चक्षु आदिके अन्वय-व्यतिरेककी प्रतीति होनेपर भी जाग्रत् गज आदिका अनुभव ही चक्षु आदिसे जन्य है, स्वाप्नगजादिका अनुभव चक्षु आदिसे जन्य नहीं है ।

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