भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

पृष्ठ 39, कुल 590 में से

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विधिविचार ] भाषानुवादसहित ११


मस्ति । लोके कृतश्रवणस्याऽपि बहुशस्तदनुत्पत्तेः, अकृतश्रवणस्याऽपि गर्भगतस्य वामदेवस्य तदुत्पत्तेरुभयतो व्यभिचारात् । न वा 'श्रवणमात्रं


रूप कोई प्रमाण नहीं है, क्योंकि लोकमें प्रायः देखा जाता है कि वेदान्तश्रवण करनेपर भी आत्मसाक्षात्कार नहीं होता । और वेदान्तश्रवण न करनेपर भी गर्भाशयमें ही वामदेव मुनिको आत्माका साक्षात्कार हुआ था । इसलिए दोनों अन्वयव्यभिचार और व्यतिरेकव्यभिचार हैं । [ वामदेवके विषयमें श्रुति है कि 'गर्भ एवैतच्छयानो वामदेव एवमुवाच' ( गर्भमें ही सोते हुए वामदेवने आत्म-ज्ञानके बलसे अपनी शक्तिका परिचय दिया—मैं मनु हुआ इत्यादि ) इससे यह बात स्पष्ट होती है कि श्रवण न होनेपर भी वामदेवको आत्मज्ञान हुआ । यह कल्पना भी नहीं कर सकते हैं कि गर्भमें उसने श्रवण किया होगा, अत एव उसको आत्मज्ञान हुआ, क्योंकि गर्भमें श्रावयिताके अभावसे यह सब होना असम्भव है । परन्तु यहाँपर यह शङ्का होती है कि गान्धर्वशास्त्रके ( गानशास्त्रके ) श्रवणसे षड्ज आदि स्वरोंका साक्षात्कार होता है, और गान्धर्वशास्त्रका श्रवण न होनेपर उन स्वरोंका साक्षात्कार नहीं होता, यह बात निर्विवाद है, इस परिस्थितिमें श्रोतव्य अर्थविशेषके—स्वरोंके साक्षात्कारके प्रति गान्धर्वशास्त्रविचाररूप श्रवणको कारण माननेकी अपेक्षा लाघवप्रमाणसे 'श्रोतव्य जितने अर्थ हैं उन सभीके साक्षात्कारके प्रति श्रवणमात्र कारण है, ऐसे कार्यकारणभावका ग्रहण करना उचित है, अतः ब्रह्मसाक्षात्कार और वेदान्त-वाक्यश्रवणका विशेषरूपसे कार्यकारणभाव न होनेपर भी सामान्यरूपसे आत्म-साक्षात्कार और वेदान्तश्रवणका परस्पर कार्यकारणभाव है, क्योंकि आत्म-साक्षात्कार श्रोतव्य अर्थका साक्षात्कार है और वेदान्तका विचार श्रवण है, इसलिए श्रोतव्य ( विचारने योग्य ) आत्मरूप अर्थके साक्षात्कारके प्रति वेदान्त-


यदि अन्वयव्यभिचार होगा, तो अनन्यथासिद्ध नहीं होगा, और व्यतिरेकव्यभिचार होगा तो कार्यके अधिकरणमें नहीं रहेगा । प्रकृतमें वेदान्तश्रवणके रहते भी अनेक मनुष्योंको आत्माका साक्षात्कार नहीं होता और वेदान्तश्रवणके अभावमें भी वामदेव ऋषिको आत्माका साक्षात्कार हुआ था, अतः वेदान्तश्रवणमें अन्वयव्यभिचार और व्यतिरेक-व्यभिचार दोष होनेसे लोकतः वह आत्म-साक्षात्कारके प्रति कारण नहीं है, यह भाव है । इसलिए श्रवणविधिको अपूर्वविधि मानना चाहिए यह प्रकटार्थकार आदिका अभिप्राय है ।

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