भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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पृष्ठ 402
३७२सिद्धान्तलेशसंग्रह[ द्वितीय परिच्छेद

त्वप्रयुक्तम्' इति तत्त्वशुद्धिकारादिमते तत्तदर्थक्रियाप्रयोजकोदकत्वादिजात्य- भावादेव तदप्रसङ्गात् ।

अन्ये तु जातिरस्त्येव काचिदर्थक्रियाऽपि च ।
हेतूच्छेदेन बाधेनाऽनध्यासेन च नाऽखिला ॥५४॥

कुछ लोग कहते हैं कि मरुमरीचिका जल आदिमें उदकत्व आदि जाति है और उक्तस्थलमें कोई अर्थक्रिया भी वहाँ होती है, परन्तु हेतुके उच्छेदसे, बाधसे और अनध्याससे सम्पूर्ण अर्थक्रियाएँ नहीं होती हैं॥ ५४ ॥

तत्राप्युदकत्वादिजातिरस्ति । अन्यथा तद्वैशिष्ट्योल्लेखिभ्रमविरोधाद्, उदकार्थिनस्तत्र प्रवृत्त्यभावप्रसङ्गाच्चेति प्रातिभासिके पूर्वदृष्टसजातीयत्वव्यवहारानुरोधिनां मते क्वचिदधिष्ठानविशेषज्ञानेन समूलाध्यासनाशात्,

उदकत्व आदि जाति ही नहीं है, अतः तथाकथित प्रसिद्ध उदक आदिसे होनेवाली अर्थक्रियाओंका प्रातिभासिक जलादिसे प्रसङ्ग नहीं है, यह भाव है।

* मरीचिकाजल आदिमें भी उदकत्व आदि जातियाँ हैं। यदि उनमें उदकत्वादि जातियाँ न मानी जाँय, तो उदकत्व आदि जातियोंका अवगाहन करनेवाले भ्रमोंके साथ विरोध होगा, और दूसरी बात यह है कि जलादि के अभिलाषुओंकी प्रवृत्ति ही उन स्थलोंमें नहीं होगी †, इस प्रकारसे प्रातिभासिक पदार्थोंमें जो पूर्वदृष्ट पदार्थोंकी सजातीयता ‡ मानते हैं, उनके मतमें तत्-तत् भ्रमविषयीभूत पदार्थोंमें तत्-तत् अर्थक्रियाकारिता इसलिए नहीं होती है कि कहींपर ✕ अधिष्ठानगत विशेषांशके परिज्ञानसे समूल-अध्यासका विनाश


❀ प्रातिभासिक जलादि पदार्थोंमें जलत्व आदि जातिका अङ्गीकार करके भी उक्त अतिप्रसङ्गका निवारण कुछ लोग करते हैं—'तत्रापि' इस ग्रन्थसे ।
† क्योंकि प्रवृत्तिके प्रति इष्टतावच्छेदकविशिष्टका ज्ञान प्रयोजक है, प्रकृत प्रातिभासिक जलादि पदार्थोंमें यदि जलत्वादि धर्मोका अङ्गीकार न किया जाय, तो इष्टतावच्छेदक जलत्वादि-वैशिष्ट्यावगाही ज्ञानके न होनेसे जलार्थीकी प्रवृत्ति ही नहीं होगी। परन्तु होती है, अतः जलत्वादि जातियाँ माननी चाहिएँ, यह भाव है।
‡ तात्पर्य यह है कि प्रातिभासिक और व्यावहारिक जलमें एक जातिके न माननेपर भाष्यादिमें प्रतिभासिकाध्यासोंमें पूर्वदृष्टकी सजातीयताका जो व्यवहार किया गया है, वह भी विरुद्ध होगा, यदि प्रातिभासिक जलमें जलत्वादि न माने जाँय तो ।
✕ मनुष्य दूरसे मरीचिकामें जलकी भ्रान्तिके बाद स्नान आदिके लिए उनके पास गया, जानेके