भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

पृष्ठ 405, कुल 590 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 405

मिथ्याके मिथ्या होनेपर भी प्रपञ्चमिथ्यात्व-विचार] भाषानुवादसहित ३७५


तच्च धर्मिणः सत्यत्वप्रतिक्षेपकम्। धर्मस्य स्वविरुद्धधर्मप्रतिक्षेपकत्वे हि उभयवादिसिद्धं धर्मिसमसत्त्वं तन्त्रम्, न पारमार्थिकत्वम्। अघटत्वादिप्रतिक्षेपके पटत्वादावस्माकं पारमार्थिकत्वासम्प्रतिपत्तेः। ब्रह्मणः सप्रपञ्चत्वं न धर्मिसमसत्ताकमिति न निष्प्रपञ्चत्वप्रतिक्षेपकम्।

अत एव मिथ्यात्वस्य व्यावहारिकत्वे तद्विरोधिनोऽप्रातिभासिकस्य


आकाश आदि प्रपञ्चके साथ समानस्वभाव है अर्थात् आकाश आदि पदार्थोंकी जैसी सत्ता है, वैसी ही सत्ता मिथ्यात्वकी भी है। और वह मिथ्यात्व धर्मीके सत्यत्वका विरोधी—विघातक—है, अपने विरुद्ध धर्मका विरोध करनेमें धर्मका धर्मीसे समानसत्ताकत्व वादी और प्रतिवादी दोनोंके मतमें प्रयोजक है, धर्मकी पारमार्थिकता प्रयोजक नहीं है, क्योंकि अघटत्वके प्रतिक्षेपक पटत्व आदिमें हमारे (वेदान्तीके) मतसे पारमार्थिकत्व सम्प्रतिपन्न—निश्चित—नहीं है। ब्रह्मका प्रपञ्चतादात्म्य धर्मिसमानसत्तक नहीं है, अतः निष्प्रपञ्चत्वका प्रतिक्षेपक नहीं है।

इसीसे ‡ यह भी प्रश्न निरस्त हुआ समझना चाहिए कि यदि मिथ्यात्व व्यावहारिक हो, तो उसका विरोधी अप्रातिभासिक प्रपञ्चसत्यत्व पारमार्थिक


आदि पदार्थोंकी व्यावहारिक सत्ता है, इसलिए मिथ्यात्वकी भी व्यावहारिक सत्ता होगी। इस विषयमें यदि शङ्का हो कि आरोपित घटत्व आदि आरोपाधिकरणीभूत अपने आश्रय पटादिमें विरुद्ध अघटत्व आदिके विघातक नहीं देखे जाते हैं, अतः सत्य घटत्व आदि स्वविरुद्ध धर्मोंके स्वाश्रयमें प्रतिक्षेपक होंगे? इस दशामें मिथ्याभूत मिथ्यात्व प्रपञ्चके सत्यत्वका कैसे विरोधी होगा, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि स्वविरुद्ध धर्मका प्रतिक्षेपक वही धर्म होता है, जो धर्मिसमानसत्तावाला हो, इस प्रकारका उभयवादिसिद्ध एक प्रयोजक मानना चाहिए, संदिग्ध नहीं मानना चाहिए, क्योंकि परमतमें घटत्वादिकी सत्ता पारमार्थिक है, और हमारे मतमें नहीं है, अतः सत्यत्व धर्म स्वाश्रयमें स्वविरुद्ध धर्मका प्रतिक्षेपक नहीं हो सकता है, किन्तु मूलोक्त धर्मिसमानसत्ताक धर्म ही प्रतिक्षेपक हो सकता है, यह भाव है।

‡ प्रकृतमें यह शङ्का हो सकती है कि प्रपञ्चगतमिथ्यात्वके मिथ्यात्वपक्षमें उस मिथ्यात्वको व्यावहारिक ही मानना चाहिए, क्योंकि उसकी निवृत्ति केवल ब्रह्मज्ञानसे होती है, इसलिए उसे प्रातिभासिक, या पारमार्थिक नहीं मान सकते, क्योंकि प्रातिभासिक पदार्थकी निवृत्ति ब्रह्मज्ञानके सिवा अन्य ज्ञानसे भी होती है और पारमार्थिककी कभी भी निवृत्ति नहीं होती है। और उसके व्यावहारिक होनेपर प्रपञ्चगतसत्यत्व पारमार्थिक सिद्ध होता है, क्योंकि 'सन् घटः' इत्यादि प्रत्यक्षसे सिद्ध प्रपञ्चका सत्यत्व ब्रह्मज्ञान तक अनुवृत्त होता है अतः प्रातिभासिक नहीं मान सकते हैं और व्यावहारिक मिथ्यात्वधर्मसे युक्त प्रपञ्चमें सत्यत्वको व्यावहारिक नहीं मान सकते

ankurnagpal108@gmail.com

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या) · पृष्ठ 405, कुल 590 में से · BharatKosha