भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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पृष्ठ 410
३८०सिद्धान्तलेशसंग्रहे[ द्वितीय परिच्छेद

समन्वयो न युक्तः। न च तेषां ब्रह्माभेदः प्रागुक्तो युक्तः, परस्परं- भिन्नानां तेषाम् एकेन ब्रह्मणाऽभेदासम्भवात् । न च तद्भेदासिद्धिः । सुखदुःखादिव्यवस्थया तत्सिद्धेरिति चेद्, न ; तेषामभेदेऽपि उपाधिभेदा- देव तद्व्यवस्थोपपत्तेः ॥ १० ॥

नन्वन्यभेदादन्यस्य कथं साङ्कर्यवारणम् ।

यदि शङ्का हो कि दूसरे के भेदसे दूसरे का भोगसाङ्कर्य कैसे परिहृत होगा ?

ननु उपाधिभेदेऽपि तदभेदानपायात् कथं व्यवस्था । नह्याश्रय- भेदेनोपपादनीयो विरुद्धधर्मसाङ्करस्तदतिरिक्तस्य कस्यचिद्भेदोपगमेन सिध्यति ।

अत्राहुरन्यताऽसङ्गे भोक्तृतादात्म्यकल्पनात् ॥ ६९ ॥

इसके परिहारमें कहते हैं कि अन्यत्व है ही नहीं, क्योंकि असङ्ग आत्मामें भोक्तृ- तादात्म्य कल्पित है ॥ ६९ ॥

अत्र केचिदाहुः—सिध्यत्येवाऽन्तःकरणोपाधिभेदेन सुखदुःखादिव्य-

उनके साथ ब्रह्मका जो अभेद कहा गया है, वह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जो परस्पर भिन्न हैं, उनका एक ब्रह्मके साथ अभेद नहीं हो सकता है । और भेदकी असिद्धि है, यह भी नहीं हो सकता है, क्योंकि सुख और दुःख आदिकी व्यवस्थासे उसकी सिद्धि है । तो यह भी शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि उन अपवर्गभागी जीवोंका वस्तुतः ब्रह्मके साथ अभेद ही है, तथापि उपाधिके बलसे उनका भेद हो सकता है ॥१०॥

यदि शङ्का हो कि उपाधिके भिन्न होनेपर भी आत्माके अभेदका विनाश न होनेके कारण सुख, दुःख आदिकी व्यवस्था कैसे होगी ? क्योंकि जिन विरुद्ध धर्मोंके असाङ्कर्यका—आश्रयके भेदसे—उपपादन करना है, उनकी किसी भिन्न वस्तुके भेदसे उपपत्ति कैसे हो सकती है ?

इस * आक्षेपके समाधानमें कुछ लोग कहते हैं—अन्तःकरणरूप उपाधि-


* अन्तःकरण ही कर्तृत्वादि प्रपञ्चका आश्रय है और 'अहम्' अनुभवका गोचर है, आत्मा नहीं, क्योंकि वह कूटस्थ है, इसलिए आश्रयके भेदसे व्यवस्था हो सकती है, यह 'केचित्' पक्षका भाव है ।

ankurnagpal108@gmail.com