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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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३८४सिद्धान्तलेशसंग्रह[ द्वितीय परिच्छेद

अन्ये भोक्ता चिदाभासः कूटस्थैक्येन कल्पितः ।
अतो न भिन्नगामित्वामित्याहुर्बन्धमोक्षयोः ॥ ६० ॥

कुछ लोग कहते हैं कि कूटस्थके तादात्म्यरूपसे कल्पित चिदाभास ही भोक्ता है, अतः बन्ध और मोक्षका वैयधिकरण्य नहीं है ॥ ६० ॥

अन्ये तु जडस्य कर्तृत्वादिवन्धाश्रयत्वानुपपत्तेः 'कर्ता शास्त्रार्थवत्त्वाद्' इति चेतनस्यैव तदाश्रयत्वप्रतिपादकसूत्रेणान्तःकरणे चिदाभासो बन्धाश्रयः । तस्य चाऽसत्यस्य बिम्बाद्भिन्नस्य प्रत्यन्तःकरणभेदाद्विद्वदविद्वत्सुखिदुःखिकर्त्रकर्त्रादिव्यवस्था । न चैवमध्यस्तस्य वन्धाश्रयत्वे बन्धमोक्षयोर्वैयधिकरण्यापत्तिः । अस्य चिदाभास्यान्तःकरणावच्छिन्ने स्वरूपतस्सत्यतया मुक्त्यन्वयिनि परमार्थजीवेऽध्यस्ततया कर्तृत्वाश्रयचिदाभासतादात्म्याध्यासाधिष्ठानभावस्तस्य बन्ध इत्यभ्युपगमादित्याहुः ।

कुछ लोग ‡ कहते हैं कि जड़ अन्तःकरण कर्तृत्व आदि धर्मोंका आश्रय नहीं हो सकता है, इसलिए 'कर्ता शास्त्रार्थवत्त्वात्' इस—चेतनमें कर्तृत्वादि धर्मोंका प्रतिपादन करनेवाले—सूत्रके आधारपर अन्तःकरणमें पड़ा हुआ चैतन्याभास (चैतन्यप्रतिविम्ब) कर्तृत्वादि प्रपञ्चका आश्रय है । बिम्बसे भिन्न मिथ्यारूप उस प्रतिबिम्बका प्रत्येक अन्तःकरणमें भेद होनेके कारण विद्वान् और अविद्वान्, सुखी और दुःखी, कर्ता और अकर्ता आदिकी व्यवस्था हो सकती है । यदि शङ्का हो कि बिम्ब और प्रतिबिम्बका भेद माननेपर जो अध्यस्त चैतन्य है, वह बन्धका (कर्तृत्वादि प्रपञ्चका) आश्रय होगा और अनध्यस्त बिम्बचैतन्य मोक्षका आश्रय होगा, इस अवस्थामें बन्ध और मोक्षका सामानाधिकरण्य नहीं होगा ? तो यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि यह चिदाभास अन्तःकरणावच्छिन्न पारमार्थिक जीवमें, जो ख—


भी अध्यस्त होता है, इसलिए तथाकथित अव्यवस्थाका आपादन नहीं हो सकता है, यह समाधानका भाव है ।

‡ आत्माके ऐक्यपक्षमें यह अन्य समाधान कहते हैं, जड़ अन्तःकरण कर्ता नहीं है, किन्तु आत्मा है, इसमें 'कर्ता शास्त्रार्थवत्त्वात्' (ब्र० सू० अ० २ पा० ३ अधि० १४ सूत्र ३३) यह सूत्र प्रमाण है, क्योंकि इस सूत्रमें कर्ता आत्मा ही है बुद्धि (अन्तःकरण) नहीं है, ऐसा प्रतिपादन किया गया है ।

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