सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 416, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३८६ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ द्वितीय परिच्छेद |
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परे कर्तृमनःसङ्गाद्भोक्तृताऽन्या प्रकल्प्यते ।
स्फटिकेण्विव लौहित्यं श्रोत्रवत्तद्व्यवस्थितिः ॥ ६२ ॥
कुछ लोग कहते हैं कि कर्तृरूप मनके सान्निध्यसे आत्मामें अन्य भोक्तृता कल्पित है, जैसे कि जपाकुसुमके सान्निध्यसे स्फटिकमें अन्य ही लौहित्य कल्पित होता है, श्रोत्रके समान व्यवस्था हो सकती है ॥ ६२ ॥
इतरे तु अस्तु केवलश्चेतनः कर्तृत्वादिबन्धाश्रयः । स्फाटिकरौहित्यन्यायेनाऽन्तःकरणस्य, तद्विशिष्टस्य वा कर्तृत्वाद्याश्रयस्य सन्निधानाच्चेतनेऽपि कर्तृत्वाद्यन्तरस्याऽध्यासोपगमात् । न च तस्यैकत्वाद् व्यवस्थाऽनुपपत्तिः, उपाधिभेदादेव तदुपपत्तेः । न चाऽन्यभेदादन्यत्र विरुद्धधर्म-
अन्य लोग कहते हैं कि केवल चैतन्य ही कर्तृत्वादि प्रपञ्चका आश्रय है । स्फटिकलौहित्यन्यायसे x अन्तःकरणके अथवा अन्तःकरणविशिष्ट कर्तृत्वादि-के आश्रयीभूत चैतन्यके सन्निधानसे चेतनमें भी अन्य कर्तृत्वादि धर्म अध्यस्त हो सकते हैं । यदि शङ्का हो कि चैतन्यके एक होनेसे कोई सुखी, कोई दुःखी है, आदि व्यवस्था नहीं होगी, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि उपाधिके भेदसे ही उक्त व्यवस्था हो सकती है । पुनः यदि शङ्का हो कि अन्यके भेदसे अन्यत्र विरुद्ध धर्मोंकी व्यवस्था नहीं हो सकती है, तो यह
विशिष्टके अन्तर्गत विशेष्यका और शुद्धका परस्पर अभेद स्वाभाविक है और भेद काल्पनिक है, प्रकृतमें विशिष्ट आत्मामें रहनेवाले बन्धका शुद्धमें भी अन्वय होता है, अतः संसार और मोक्षके वैयधिकरण्यका संभव नहीं है, यह भाव है।
x जैसे लौहित्य (रक्तरूप) के आश्रयीभूत जपाकुसुमके सन्निधानसे स्फटिकमें उपाधिगत लौहित्यसे अन्य प्रतिबिम्बभूत लौहित्य उत्पन्न होता है, वैसे ही चिदात्मामें अन्तःकरण आदिमें रहनेवाले संसारसे अन्य ही विलक्षण अध्यासत्मक कर्तृत्वादि प्रपञ्चकी उत्पत्ति होती है, यह तात्पर्य है। यदि शङ्का हो कि साक्षीद्वारा अन्तःकरण आदिमें अनुभूयमान प्रपञ्चका ही चिदात्मामें संसर्गाध्यास माननेसे वैयधिकरण्यशङ्काका समाधान हो सकता है, फिर बुद्धि आदिमें रहनेवाले प्रपञ्चके सदृश अन्य प्रपञ्चकी उत्पत्ति माननेमें कोई प्रमाण ही नहीं है ? तो यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि 'बुद्धेर्गुणेन...आऽऽराग्रमात्रो ह्यवरः' (अन्तःकरणके गुणसे जीव आराके अग्र भागके समान अर्थात् अत्यल्पपरिमाण है) इस श्रुतिसे बुद्धिके गुणसे ही जीवमें अल्पपरिमाणका प्रतिपादन किया गया है, इस न्यायसे बुद्धिधर्मके सदृश कर्तृत्वादिकी भी आत्मामें उपपत्ति हो सकती है, अतः उक्त कल्पना प्रमाणशून्य नहीं है, यह भाव है ।