भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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४७०सिद्धान्तलेशसंग्रह[ तृतीय परिच्छेद ]

'वेदान्तवाक्यजज्ञानभावनाजाऽपरोक्षधीः ।
मूलप्रमाणदार्थ्येन न भ्रमत्वं प्रपद्यते ॥
न च प्रामाण्यपरतस्त्वापत्तिस्तु प्रसज्यते ।
अपवादनिरासाय मूलशुद्ध्यनुरोधनात् ॥' इति ।
अन्ये तु मन एवाहुरेनां तत्सहकारिणीम् ।

कुछ लोग कहते हैं कि मन ही ब्रह्मसाक्षात्कारमें कारण है और प्रत्ययावृत्ति मनकी सहकारी कारण है ।

अन्ये तु 'एषोऽणुरात्मा चेतसा वेदितव्यः', 'दृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्या' इत्यादिश्रुतेर्मन एव ब्रह्मसाक्षात्कारे करणम्, तस्य सोपाधिकात्मनि अहंवृत्तिरूपप्रमाकरणत्वक्लप्तेः । 'स्वप्नप्रपञ्चविपरीतप्रमात्रादिज्ञानसाधनस्यान्तःकरणस्य' इत्यादिपञ्चपादिकाविवरणग्रन्थैरपि तथा

' वेदान्तवाक्यजज्ञान० '
अर्थात् वेदान्तवाक्योंके ज्ञानरूप अभ्याससे होनेवाली अपरोक्ष बुद्धि वेदान्तवाक्यकी अथवा इससे होनेवाली प्रमाकी दृढ़तासे (अविप्रतिपन्न प्रामाण्य होनेसे) भ्रम नहीं होती है । इससे परतः प्रामाण्यापत्ति भी प्रसक्त नहीं है, क्योंकि अपवादके (अप्रामाण्य शङ्काके) निरासके लिए मूल प्रमाणकी शुद्धिकी अपेक्षा की गई है ।

  • कुछ लोग कहते हैं कि 'एषोऽणुरात्मा०' (इस अत्यन्त सूक्ष्म आत्माको मनसे जानना चाहिए) 'दृश्यते०' (कुशाग्र बुद्धिसे आत्मा देखा जाता है) इत्यादि अनेक श्रुतियोंसे आत्मसाक्षात्कारमें मन ही कारण प्रतीत होता है, क्योंकि मनमें सोपाधिक आत्माके अहमाकार वृत्तिरूप प्रमात्मक साक्षात्कारके प्रति करणता लोकमें प्रसिद्ध है, और 'प्रातिभासिक स्वप्न प्रपञ्चसे विपरीत व्यावहारिक प्रमाता आदि पदार्थोंके ज्ञानके प्रति साधनभूत अन्तःकरणके' इत्यादि प्रपञ्चपादिका आदि विवरणग्रन्थोंसे प्रमाताशब्दसे कहलानेवाले सोपाधिक

सकती है, तो प्रसंख्यानकी क्या आवश्यकता है ? तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि प्रसंख्यानके पूर्वमें अविद्याके निवर्तक अप्रतिबद्ध ब्रह्मावगति उत्पन्न नहीं हो सकती है, यह भाव है।

* केवल प्रसंख्यान ही ब्रह्मसाक्षात्कारके प्रति कारण नहीं है, किन्तु तत्सहकृत अन्तःकरण ही ब्रह्मसाक्षात्कारके प्रति कारण है, इस प्रकारके मतका अवलम्बन करनेवालोंके मतका निरूपण इस ग्रन्थसे करते हैं ।

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