सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 503, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मसाक्षात्कारमें करणविचार ] भाषानुवादसहित ४७३
करणम्, न मनः । 'यन्मनसा न मनुते' इति तस्य ब्रह्मसाक्षात्कारकरणत्वनिषेधात् । न चाऽपक्वमनोविषयमिदम् । 'येनाहुर्मनो मतम्' इतिवाक्यशेषे मनोमात्रग्रहणात् । न चैवं 'यद्वाचाऽनभ्युदितम्' इति शब्दस्यापि तत्करणत्वं निषिध्यते इति शङ्क्यम्, मनःकरणत्ववादिनामपि शब्दस्य निर्विशेषपरोक्षज्ञानकरणत्वस्याभ्युपगतत्वेन तस्य 'यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह' इति श्रुत्यनुरोधेन शब्दार्थप्राप्तिरूपशक्तिमुखेन शब्दस्य तत्करणत्वनिषेधे तात्पर्यस्य वक्तव्यतया शक्यसम्बन्धरूपलक्षणामुखेन तस्य तत्कारणत्वाविरोधात् । न च 'मनसैवानुद्रष्टव्यम्' इति श्रुतिसिद्धं मनसोऽपि तत्करणत्वं न पराकर्तुं शक्यमिति वाच्यम्,
नहीं। क्योंकि 'यन्मनसा न मनुते' (जिसका मनसे ज्ञान नहीं हो सकता है) इस श्रुतिसे ब्रह्मसाक्षात्कारके प्रति मनकी साधनताका निषेध किया गया है। यदि शङ्का हो कि वह निषेध अपक्व मनके लिए है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि 'येनाहुर्मनो मतम्' (जिस चैतन्यसे मनका प्रकाश होता है) इस प्रकारके वाक्यशेषमें सामान्य मनका ही ग्रहण है। यदि शङ्का हो कि 'यद्वाचानभ्युदितम्' (जिस चैतन्यका वाणीसे प्रकाश नहीं होता है) इस श्रुतिसे शब्दकी भी ब्रह्मसाक्षात्कारके प्रति कारणताका खण्डन किया गया है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि मन जिसके मतमें साक्षात्कारके प्रति करण है, उसके मतमें भी शब्दको निर्विशेष वस्तुके परोक्षज्ञानके प्रति करण मानते हैं, अतः 'यद्वाचानभ्युदितम्' इत्यादि निषेधका 'यतो वाचो०' ❊ (मनके साथ वाणी भी प्राप्ति न कर जिससे निवृत्त होती है) इस प्रकारकी श्रुतिके अनुरोधसे शब्दकी अर्थप्राप्तिरूपा शक्तिके निषेध द्वारा शब्दनिष्ठ साक्षात्कारके निषेधमें तात्पर्य है, ऐसा कहना होगा, इसलिए शक्यसम्बन्धरूप लक्षणाके द्वारा शब्दमें ब्रह्मसाक्षात्कारकी करणताका निषेध नहीं है। यदि शङ्का हो कि 'मनसैवानुद्रष्टव्यम्' (मनसे ही ब्रह्मका साक्षात्कार करना चाहिए) इस श्रुतिसे मनमें सिद्ध हुई साक्षात्कारकरणताका निषेध नहीं कर सकते हैं, तो यह भी
❊ अर्थात् पूर्वापरवाक्योंके अनुसन्धानसे यही ज्ञात होता है, कि शब्द शक्तिवृत्तिसे ब्रह्मका बोधक नहीं है, परन्तु लक्षणावृत्तिसे बोधक नहीं है, यह नहीं मान सकते हैं, यह भाव है।