सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 529, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ेंअज्ञानके निवर्तकका निरूपण ] भाषानुवादसहित ४९९
विशेषणविशेष्यतत्सम्बन्धगोचरत्वाविशेषेऽपि विशिष्टज्ञानस्य विशेषणज्ञानादिकारणविशेषाधीनस्वरूपसम्बन्धविशेषेण तत्रितयगोचरत्वमेव समूहालम्बनव्यावृत्तं विशिष्टज्ञानत्वम्, यथा वा 'स्थाणुत्वपुरुषत्ववान्' इति आहार्यवृत्त्यावृत्तं संशयत्वं विषयतो विशेषाानिरूपणात्, तथा घटादावपि 'सोऽयं घटः' इत्यादिज्ञानस्य स्वरूपसम्बन्धविशेषेण घटादिविषयत्वमेव
वाक्यजन्य जीवब्रह्माभेदविषयक ज्ञानत्व है, क्योंकि * जैसे विशेषण, विशेष्य और उनके संसर्गविषयताकी बराबरी होनेपर भी विशेषणज्ञान आदि कारणविशेषके अधीन स्वरूपसम्बन्धविशेषसे उक्त त्रितयविषयता ही समूहालम्बनव्यावृत्त विशिष्टज्ञानत्व है अथवा जैसे 'स्थाणुत्वपुरुषत्ववान्' इस प्रकार आहार्यवृत्तिसे व्यावृत्त † संशयत्व है, क्योंकि विशिष्टज्ञानमें और 'स्थाणुर्वा पुरुषो वा' इस प्रकारके संशयात्मक ज्ञानमें विषयतः विशेषका निरूपण नहीं हो सकता है, वैसे ‡ घटादिस्थलमें भी 'सोऽयं घटः' ( वही यह घट है) इत्यादि ज्ञानमें
* महावाक्यजन्य ज्ञानके घटादिज्ञानकी अपेक्षासे चैतन्य अंशमें विषयप्रयुक्त विशेषके न होनेपर भी सामग्रीविशेषसे घटादिज्ञानकी अपेक्षा वैलक्षण्य है, उसका इस ग्रन्थसे स्पष्टीकरण करते हैं, 'दण्डी पुरुषः' ( दण्डवान् पुरुष है ) इस प्रकारके विशिष्ट ज्ञानमें तीन विषय हैं, इसी प्रकार 'दण्डपुरुषसंयोगाः' इस प्रकारके समूहालम्बन ज्ञानमें भी ये तीन विषय हैं, इसलिए उक्त विशिष्ट ज्ञान और समूहालम्बनात्मक ज्ञानका परस्पर विषय भेद नहीं कर सकते हैं। क्योकि विषय तो समान हैं, इसलिए विशेषण, विशेष्य और संसर्गके ज्ञान आदि कारण विशेषके अधीन स्वरूपसम्बन्धविशेषसे विशेषणादित्रयविषयकत्व ही समूहालम्बनज्ञानव्यावृत्त विशिष्टज्ञानत्व है, इस प्रकार सामग्रीविशेषसे उक्त विशिष्टज्ञान और समूहालम्बनात्मक ज्ञानमें वैलक्षण्य मानना होगा, इसी प्रकार तत्त्वमस्यादि वाक्यजन्य ज्ञानमें भी सामग्रीप्रयुक्त ही वैलक्षण्य है, यह भाव है ।
† 'स्थाणुत्वविरुद्धपुरुषत्ववान्' ( स्थाणुत्वसे विरुद्ध जो पुरुषत्व, तद्वान् ) इस प्रकारका निश्चय संशयसमानविषयक आहार्यवृत्तिरूप कहलाता है, इससे व्यावृत्त संशयत्व भी विषयप्रयुक्त नहीं है, किन्तु सामग्रीविशेषप्रयुक्त है, क्योंकि विषयकृत भेद तो आहार्यवृत्तिसे संशयमें नहीं आ सकता है, क्योंकि विषय समान है, यह भाव है ।
‡ उक्त प्रकारकी व्यवस्था केवल 'तत्त्वमसि' आदि वाक्यजन्य ज्ञानके अभेद ज्ञानत्वमें ही नहीं है, किन्तु 'सोऽयं घटः' 'सोऽयं देवदत्तः' ( यही यह घट है और वही यह देवदत्त है ) इत्यादि वाक्यजन्य ज्ञानके केवल घटशब्द और देवदत्तशब्दसे होनेवाले ज्ञानसे व्यावृत्त अभेद-