सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 55, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ेंविधिविचारं ] भाषांनुवादसहितं २७
यद्वा, यथा 'मन्त्रैरेव मन्त्रार्थस्मृतिः साध्या' (पूर्वमी० अ० १ पा० २ अ० ४) इति नियमः, तन्मूलकल्पसूत्रात्मीयग्रहणकवाक्यादीनामपि पक्षे प्राप्तेः; तथा वेदान्तमूलेतिहासपुराणपौरुषेयप्रबन्धानामपि पक्षे प्राप्तिसम्भवान्नियमोऽयमस्तु। सर्वथा नियमविधिरेवायम् ।
'सहकार्यन्तरविधिः' (अ० ३ पा० ४ अधि० १४ सू० ४७) इत्यधिकरणभाष्ये अपूर्वविधित्वोक्तिस्तु नियमविधित्वेऽपि पाक्षिकाप्राप्तिसद्भावात् तदभिप्रायेति तत्रैव 'पक्षेण' इति पाक्षिकाप्राप्तिकथनपरसूत्रपदयोजनेन स्पष्टीकृतमिति विवरणानुसारिणः ।
अथवा जैसे * 'मन्त्रैरेव' ( मन्त्रोंसे ही मन्त्रार्थका स्मरण करे ) यह नियम माना गया है, क्योंकि यदि यह नियम न माना जाय, तो मन्त्रमूलक कल्पसूत्र, आत्मीयग्रहणक वाक्य आदिकी भी पक्षमें प्राप्ति होगी, वैसे ही प्रकृतमें भी वेदान्तमूलक इतिहास, पुराण और पुरुषनिर्मित ग्रन्थोंके श्रवणमें भी पक्षमें प्राप्ति हो सकती है (उसकी निवृत्तिके लिए श्रोतव्यः) यह नियमविधि है। इससे सर्वथा यह नियमविधि ही है।
और 'सहकार्यन्तरविधिः' इत्यादि अधिकरणके भाष्यमें अपूर्वविधिका जो कथन है, वह नियमविधिके रहते भी पाक्षिक अप्राप्तिके सद्भावके अभिप्रायसे है, यह प्रकार पूर्वोक्त अधिकरणके भाष्यमें ही 'पक्षेण' इस शब्दसे पाक्षिक अप्राप्तिके कथनपरक सूत्रके पदके योजनसे स्पष्ट किया गया है, यह विवरणानुसारी लोगोंका मत है ।
- 'मन्त्रैरेव मन्त्रार्थस्मृतिः साध्या' इसका निर्णय पूर्वपक्ष और उत्तरपक्ष द्वारा निम्न रीतिसे किया गया है—पहले पूर्वपक्ष होता है कि 'उरु प्रथस्व' ( हे पुरोडाश तुम प्रचुर परिमाणमें बढ़ो ) इत्यादि जितने मन्त्र प्रयोगोंमें उपयुक्त हैं वे सबके सब केवल अदृष्ट ही उत्पन्न करते हैं—अर्थप्रकाशनके लिए उनका उच्चारण नहीं होता, क्योंकि उरु प्रथन रूप अर्थ ब्राह्मणवाक्यसे भी प्रतीत होता है—'उरु प्रथस्वेति पुरोडाशं प्रथयति' इससे मन्त्रोंका केवल अदृष्ट ही प्रयोजन है, इस प्रकार पूर्वपक्षके प्राप्त होनेपर—
सिद्धान्ती कहते हैं कि यह तुम्हारा पूर्वपक्ष एक दम निरर्थक है, क्योंकि यदि दृष्ट प्रयोजन मिलता हो, तो अदृष्ट प्रयोजन की कल्पना करना धृष्टता है, अतः यागोंमें प्रयुक्त मन्त्रोंका दृष्ट—अर्थोंका अनुस्मरण ही प्रयोजन है, यदि ब्राह्मण वाक्यसे भी मन्त्रार्थस्मरण होता है, यह कहो, तो 'मन्त्रसे ही मन्त्रार्थका स्मरण करना चाहिए' इस प्रकारका जो नियम बनेगा, उसका अदृष्ट प्रयोजन होगा, अतः यह सिद्ध हुआ