भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

पृष्ठ 551, कुल 590 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 551

अविद्यानिवृत्तिके स्वरूपका विचार ] भाषानुवादसहित ५२१


प्रत्यक्षो न स्यात्। कपालसंस्थानविशेषादिनाऽनुमेयो घटादिध्वंसो न प्रत्यक्ष इति चेत्, तर्हि तेन मुद्गरपातकालीनस्य उत्पत्तिवद् भावविकाररूपतया प्रतियोग्याश्रितध्वंसस्याऽनुमानं सम्भवतीति न ततः पश्चादनुवर्तमानप्रतियोग्यधिकरणाश्रिताभावरूपध्वंससिद्धिः। 'इह भूतले घटध्वंसः' इति भूतले ध्वंसाधिकरणत्वव्यवहारस्य 'इह भूतले घट उत्पन्नः' इतिवत् भावविकारयुक्तप्रतियोग्यधिकरणत्वविषयत्वोपपत्तेः। घटध्वंसानन्तरं भूतले घटाभावव्यवहारस्य घटापसरणानन्तरं तदभावव्यवहारवत् समयविशेष-


संस्थानविशेषसे घटादिध्वंस अनुमेय है, प्रत्यक्ष नहीं है, तो वह भी युक्त नहीं है, क्योंकि उसी कपालके संस्थानविशेष आदिसे उत्पत्तिके समान भावके विकाररूपसे अवस्थित मुद्गरपतनके समानकालीन प्रतियोगीमें आश्रित ध्वंसका भी अनुमान हो सकता है, इसलिए उस अनुमानसे प्रतियोगीके अधिकरणमें रहनेवाले ध्वंसरूप अभावकी सिद्धि नहीं हो सकती है ‡। 'इस भूतलमें घटका ध्वंस है' इस प्रकार जो भूतलमें ध्वंसाधिकरणत्वका व्यवहार होता है, वह तो इस भूतलमें घट उत्पन्न हुआ, इस प्रकारके व्यवहारके समान भावभूत विकारसे युक्त प्रतियोगीके अधिकरणत्वकी विषयताको लेकर भी उपपन्न हो सकता है। घटके ध्वंसके बाद् भूतलमें जो घटाभावका व्यवहार होता है * वह भी घटके अपसरणके बाद होनेवाले


‡ इस अनुमानसे भूतकालीन ध्वंसका भी अनुमान हो सकता है, इसलिए उक्त अनुमानसे ध्वंसमात्रकी सिद्धि होनेपर भी इससे तार्किकाभिमत ध्वंसके स्थायित्वकी सिद्धि नहीं हो सकती है, यह भाव है। यदि शङ्का हो कि यह भूतल घटध्वंसका आश्रय है, कपालमालाविशेष होनेसे, जो कपालमालाविशेषका अधिकरण भूतल नहीं है, वह घटध्वंसका अधिकरण नहीं है, इस प्रकारके अनुमानसे घटाश्रित ध्वंसकी सिद्धि कैसे होगी, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि ध्वंसकी उत्पत्तिदशामें प्रतियोगीमें ही ध्वंस यद्यपि रहता है, तथापि प्रतियोगी द्वारा भूतलमें भी ध्वंस रहता है, अतः उक्त अनुमानकी विषयता भूतलाश्रित ध्वंसमें भी है।

* तात्पर्य यह है कि घटके नष्ट हो जानेपर 'इस भूतलमें घट नहीं है' इस प्रकारका व्यवहार अत्यन्ताभावका ही—जो कि अत्यन्ताभाव किसी समयविशेषमें अर्थात् भूतल आदिमें घटादिसंयोगके अभावकालमें रहता है—अवलम्बन करता है, अतः इसी क्लृप्त अत्यन्ताभावसे यथोक्त व्यवहारकी यदि उपपत्ति हो सकती है, तो फिर अतिरिक्त ध्वंसकी अङ्गीकृति निष्फल प्रतीत होती है। और 'अतोऽन्यदार्तम्' (नित्य स्वप्रकाशचैतन्यसे इतर

६६