सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 585, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ेंमुक्तके स्वरूपका विचार ] भाषानुवादसहितं ५५५
धाच्च । भेदे तेषां गुणानां सत्यत्वेन 'चितितन्मात्रेण' इति सूत्रोक्तस्य मुक्तजीवानां चैतन्यमात्रत्वस्य 'एवमपि' इति सिद्धान्तसूत्रेऽङ्गीकारविरोधाच्च, 'सम्पद्याविर्भावः' इत्यधिकरणविरोधाच्च । तत्र हि 'स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते' इति श्रुतौ आगन्तुना केनचिद्रूपेणाभिनिष्पत्तिर्नोच्यते स्वेनशब्दवैयर्थ्यापत्तेः । येन रूपेण आगन्तुना स्वयमभिनिष्पद्यते तस्यात्मीयत्वस्याऽवक्तव्यत्वात् । तस्मादात्मवाचिश्वशब्दोपादानाद् नित्यसिद्धेन स्वस्वरूपेणैवाभिनिष्पत्तिर्विवक्षिता, न तु केनचिद्धर्मेणेति व्यवस्थापितम् ।
किञ्चेदमपहतपाप्मत्वादि जीवस्य मुक्तावागन्तुकं चेत्, 'सम्पद्याविर्भावः' इति मुक्तावागन्तुक रूपनिषेधेन 'पराभिध्यानात्तु तिरोहितम्' 'उत्तराच्चेदाविर्भूतस्वरूपस्तु' इत्यपहतपाप्मत्वादेर्बन्धमुक्तयोस्तिरोभावा-
उन गुणोंके सत्य होनेसे 'चितितन्मात्रेण' इस सूत्रमें कथित मुक्त जीवोंके चैतन्यमात्रत्वका जो 'एवमपि' इत्यादि सूत्रमें अङ्गीकार किया गया है, वह विरुद्ध होगा और सम्पद्याविर्भावः' * इस अधिकरणके साथ भी विरोध होगा, क्योंकि सम्पद्याधिकरणमें आगन्तुक किसी धर्मसे अभिनिष्पत्ति नहीं कही जा सकती है, क्योंकि वैसा माननेसे 'स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते' इस श्रुतिमें उक्त स्वेनशब्दके साथ विरोध होगा, कारण कि जिस आगन्तुक स्वरूपसे अपने आप अभिव्यक्त होता है, उसमें आत्मीयत्व नहीं रह सकता, इससे आत्माके वाचक स्वशब्दका श्रुतिमें उपादान होनेसे नित्यसिद्ध स्वरूपसे ही अभिनिष्पत्ति विवक्षित है, आगन्तुक किसी धर्मसे नहीं, ऐसा व्यवस्थापन किया गया है ।
किञ्च, यदि अपहतपाप्मत्व आदि धर्म मुक्तिमें जीवके आगन्तुक माने जायेंगे तो 'सम्पद्याविर्भावः' इससे मुक्तिमें आगन्तुक धर्मोंके निषेधसे 'पराभिध्यानात्तु तिरोहितम्' 'उत्तराच्चेदाविर्भूतस्वरूपस्तु' इत्यादि सूत्रोंसे अपहतपाप्मत्वादिका बन्ध और मुक्तिमें क्रमशः तिरोभाव और आविर्भावके
* किञ्च, अपहतपाप्मत्व आदि आठ गुण मुक्तिमें उत्पन्न होते हैं अथवा स्वतःसिद्ध ही हैं, इस प्रकारके दो विकल्प करके प्रथम विकल्पके समाधानपूर्वक द्वितीयका इस ग्रन्थसे एक प्रकारसे शेष रखते हैं, यह भाव है ।