भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

पृष्ठ 62, कुल 590 में से

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पृष्ठ 62
३४सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेदं.

पगमाच्च । ऊहापोहात्मकमानसिकक्रियारूपविचारस्यैव श्रवणत्वौचित्यात् । न च विचारस्यैव तात्पर्यनिर्णयद्वारा, तज्जन्यतात्पर्यभ्रमादिपुरुषापराध- रूपप्रतिबन्धकविगमद्वारा वा ब्रह्मज्ञानं फलमस्त्विति वाच्यम्, तात्पर्यज्ञानस्य

गया है । इसलिए ऊहापोहात्मक ‡ मानसिक क्रियारूप विचारको ही श्रवण मानना उचित है ।

अब यह शङ्का होती है कि परम्परया—तात्पर्यके निश्चय द्वारा अथवा विचारजन्य तात्पर्यभ्रम आदि पुरुषके दोषोंके निरसन द्वारा विचारका भी ब्रह्मज्ञान फल हो सकता है, फिर श्रवणसे ब्रह्मविषयक परोक्ष ज्ञान या अपरोक्ष ज्ञान नहीं हो सकता यह कहना असङ्गत है [शङ्काका भावार्थ यह है कि 'सदेव सोम्य' 'तत् सत्यम् स आत्मा' (हे सोम्य ! पहले यह सद्रूप था, वह सत्यस्वरूप है वह आत्मा है) इस प्रकार 'सदेव' से लेकर 'स आत्मा तत्त्वमसि' तक वाक्यसमूह अद्वैत आत्मपरक है, अद्वैतप्रतिपादक उपक्रम और उपसंहारका ऐक्य होनेसे, इस रीतिके विचारका अनुमितिरूप अद्वैत तात्पर्यका निश्चय साक्षात्—अव्यवहित फल है—इसके द्वारा और जो प्रतिबन्धक दोष हैं, उनका निवर्तन भी विचारका फल है । इनके द्वारा विचार भी ब्रह्मज्ञानका हेतु बन सकता है, इसलिए जैसे ज्ञान शब्द आदि प्रमाणोंका फल है, वैसे ही विचारका भी तात्पर्यनिर्णय द्वारा अथवा तज्जन्य प्रतिबन्धकोंके निरास द्वारा फल हैं इससे 'श्रवणस्य न ब्रह्मणि परोक्षमपरोक्षं वा ज्ञानं फलम्' इत्यादि उक्ति असङ्गत है, इसपर उत्तर देते हैं—उक्त शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि] तात्पर्यज्ञान शाब्दबोधमें कारण है, इस प्रकारके कार्यकारण-भावका स्वीकार नहीं किया गया है और प्रतिबन्धकके अभावका कहींपर भी


सम्पत्तिके अनन्तर मनुष्यको ब्रह्मके अपरोक्ष ज्ञानके लिए वेदान्तविचार करना चाहिए, क्योंकि सूत्रमें कहे गये जिज्ञासाशब्दकी विचारमें लक्षणा है और इस जिज्ञासासूत्रका मूल है 'श्रोतव्यः' इत्यादि वाक्य । इससे श्रवणका अर्थ यदि ज्ञान मान लिया जाय, तो 'श्रोतव्यः' इसका 'श्रवणरूप ज्ञान करना चाहिए'—यह अर्थ होगा। इस परिस्थितिमें जिज्ञासासूत्र और श्रोतव्यवाक्यका परस्पर मूलमूलिभाव अर्थात् प्रयोज्यप्रयोजकभाव नहीं होगा, क्योंकि दोनोंकी एकार्थता नहीं है, इसलिए यदि 'श्रोतव्यः' यह श्रुति जिज्ञासासूत्रका मूल है, तो श्रवणका अर्थ हम ज्ञान नहीं कर सकते, यह भाव है ।

‡ ऊह—न्यायाभासोंको—दुष्ट न्यायोंको—हटाकर निर्दुष्ट न्यायोंका प्रदर्शन ।
अपोह—न्यायाभासका निराकरण ।

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