भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

पृष्ठ 69, कुल 590 में से

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पृष्ठ 69

विधिविचार ] भाषानुवादसहितं ४१

मानं श्रवणमागमाचार्योपदेशजन्यमात्मज्ञानमेव, न तु तात्पर्यविचाररूपमिति न तत्र कोऽपि विधिः ।

आचार्यके उपदेशसे उत्पन्न होनेवाला आत्मज्ञान ही है, तात्पर्यविचाररूप नहीं है, अतः श्रवणमें कोई विधि नहीं है। भाव यह है कि जैसे मनन और निदिध्यासन, जो आत्माको विषय करते हैं, ज्ञानरूप हैं, वैसे ही श्रवण भी, जो आत्माको विषय करता है, ज्ञानरूप ही है, क्योंकि 'आत्मा श्रोतव्यः' इस श्रुतिमें आत्मा और श्रवणका परस्पर विषय-विषयिभाव सम्बन्ध प्रतीत होता है, अतः श्रवण आत्मविषयक है। यदि श्रवण विचाररूप माना जाय, तो वह आत्मविषयक न होगा और श्रवणक्रियाका कर्म आत्मा न होगा, किन्तु वेदान्तवाक्य होंगे। इससे मनन आदिमें क्लृप्त आत्मरूप कर्मका परित्याग होनेसे प्रक्रमका भङ्ग होगा। [ परन्तु मनन आदिका जो दृष्टान्त दिया गया है, उसपर कुछ आलोचना करनी चाहिए, क्योंकि आपाततः मननशब्दका अर्थ—ज्ञान नहीं होता है। मननका अर्थ है—युक्तियोंसे किसी वस्तुकी आलोचना करना अर्थात् एक वस्तुको युक्ति-प्रयुक्तियोंसे टटोलना, इससे हम मननको ज्ञानरूप नहीं मान सकते, व्यापारात्मक ही मान सकते हैं। इसी प्रकार निदिध्यासन भी ज्ञानरूप नहीं हो सकता, क्योंकि निदिध्यासन शब्दकी निष्पत्ति चिन्तार्थक 'ध्यै' धातुसे हुई है, इसलिए 'मनन आदिके समान' यह दृष्टान्त युक्त नहीं है। इसपर यह कहा जाता है कि मनन व्यापाररूप नहीं है, किन्तु अनुमितिज्ञानरूप है। और वह अनुमिति—आत्मा ब्रह्मस्वभाव है, चिद्रूप होनेसे, ब्रह्मके समान। बुद्धि आदि कल्पित हैं, दृश्य होनेसे, शुक्तिरजतके समान—इस प्रकार है। इसमें मैत्रेयीब्राह्मणका वार्तिक प्रमाण है—

आगमार्थविनिश्चित्यै मन्तव्य इति भण्यते ।
वेदशब्दानुरोध्यत्र तर्कोऽपि विनियुज्यते ॥
पदार्थविषयस्तर्कः तथैवाऽनुमितिर्भवेत् ।

श्रुतिके अर्थको दृढ करनेके लिए तर्करूप मननका विधान किया जाता है, वह तर्क वेदाविरोधी होता है तथा तत्त्वंपदार्थविषयक और अनुमित्यात्मक होता है, यह इसका भाव है। जब अनुमितिरूप मनन है, तो उसे ज्ञानरूप मानने-