सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 85, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मलक्षणविचार ] भाषानुवादसहित ५७
जगदुपादानम्, तज्जन्मनि घटजन्मनि कुलालवत्, तत्स्थितौ राज्यस्थेमनि राजवच्च उपादानादन्यदेव निमित्तं भविष्यतीति शङ्काव्यवच्छेदाय तस्यैव जगज्जननजीवननियामकत्वमुक्तम् । तथा चैकमेवेदं लक्षणम् अभिन्ननिमित्तोपादानतयाऽद्वितीयं ब्रह्मोपलक्षयतीत्याहुः ॥ २ ॥
तत्रोपादानता विश्वविवर्तास्पदता चितः ।
स्वाभिन्नन्यूनसत्ताऽर्थो विवर्त इति कथ्यते ॥ १६ ॥
लक्षणमें जो उपादानता है, वह ब्रह्मकी समस्त प्रपञ्चरूपसे विवर्ताश्रयतारूप है और विवर्त उसे कहते हैं—जो उपादानरूपसे अभिमत वस्तुसे अभिन्न होकर न्यूनसत्तावाला हो ॥ १६ ॥
ब्रह्मणश्च उपादानत्वम् अद्वितीयकूटस्थचैतन्यरूपस्य न परमाणूनामिवारम्भकत्वरूपम्, न वा प्रकृतेरिव परिणामित्वरूपम्, किन्त्वविद्यया वियदादिप्रपञ्चरूपेण विवर्तमानत्वलक्षणम् ।
अन्य कर्तृरूप कोई निमित्तकारण होगा। जैसे पालनरूप राज्यकी स्थिरतामें पालनीय प्रजा आदिके उपादानसे भिन्न राजा निमित्त कारण है, वैसे ही जगत्की स्थिति और पालनमें उपादानसे अन्य नियन्तृरूपसे स्थितिहेतुभूत कोई निमित्त कारण होगा, इस प्रकारकी शङ्काका निराकरण करनेके लिए उसी एक ही ब्रह्ममें श्रुति द्वारा जगज्जननजीवननियामकता—जगत्के जन्म और पालनके प्रति कारणता कही गई है, अतः जगज्जन्मनियामकता और जगत्पालननियामकतासे जगदुपादानमें ही जगत्के जनन आदिके प्रति निमित्तकारणताके सिद्ध होनेपर यह श्रुति द्वारा कहा गया जगज्जन्म-स्थिति-लयकारणत्वरूप एक ही लक्षण होकर अभिन्ननिमित्तोपादानत्वरूपसे अद्वितीय ब्रह्मको उपलक्षित करता है—ब्रह्मसे भिन्न वस्तुके अस्तित्वकी शङ्काके निराकरण द्वारा अद्वितीय ब्रह्मका बोधन करता है । तीन लक्षण इस अर्थके प्रतिपादक नहीं हैं, यह भाव है ॥२॥
अद्वितीय कूटस्थ चैतन्यरूप ब्रह्ममें जो जगत्की उपादानकारणता है, वह परमाणुओंके समान आरम्भकत्वरूप नहीं है अथवा प्रकृतिके समान परिणामितारूप भी नहीं है, किन्तु अविद्यासे आकाश आदि प्रपञ्चके आकारसे विवर्तमानतारूप है ।