सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 87, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मलक्षणविचार ] भाषानुवादसहित ५९
[ टिप्पणी ]
है, अतः घटरूप मृत्तिकाके अन्यथाभावमें मृत्तिकारूप उपादानकी समानसत्ता होनेसे घट मृत्तिकाका परिणाम हुआ । ब्रह्मका जगत् परिणाम नहीं हो सकता है, क्योंकि ब्रह्मकी सत्ता त्रिकालाबाधित है अर्थात् पारमार्थिक है और जगत्की सत्ता व्यावहारिक है । उपादानका अन्यथाभाव उपादानकी सत्तासे यदि विषमसत्तावाला हो, तो वह विवर्त होगा, जैसे—शुक्तिका विवर्त है—रजत । शुक्ति और उसमें उत्पन्न प्रातीतिक रजतकी समान सत्ता नहीं है, क्योंकि शुक्तिकी व्यावहारिक सत्ता है और रजतकी प्रातिभासिक सत्ता है । इन लक्षणोंका परिष्कार इस प्रकार किया जाता है—उपादानत्वाभिमतवस्तुसत्तासमानसत्ताकत्वे सति तदवस्थाविशेषरूपत्वम्—तत्परिणामत्वम् । सत्यन्त अर्थात् विशेषण दल इसलिए दिया गया है कि विवर्तमें अतिव्याप्ति दोष न हो और विशेष्य दल इसलिए दिया गया है—घट आदिमें तन्तु आदिके परिणामत्वका निराकरण हो । इसी प्रकार विवर्तका लक्षण—'उपादानत्वाभिमतवस्तुसत्ताविषमसत्ताकत्वे सति तदवस्थाविशेषरूपत्वम्' है । परिणामका वारण करनेके लिए सत्यन्त विशेषण है और विशेष्यदल ब्रह्ममें मृत्परिणामत्वकी व्यावृत्तिके लिए है । ये उपर्युक्त दो लक्षण पारमार्थिक, व्यावहारिक और प्रातिभासिक सत्ताओंको मानकर किये गये हैं । यदि ये तीन सत्ताएँ न मानी जायें और घट, शुक्ति, रजत आदि सब जगह ब्रह्मस्वरूपसत्ता ही मान ली जाय, तो इस पक्षमें उक्त दो लक्षण परिणाम और विवर्तके नहीं होंगे, इसलिए 'कारणसलक्षणो' इत्यादिसे परिणाम और विवर्तका अन्य लक्षण करते हैं । इसका अर्थ होगा 'उपादानत्वाभिमतवस्तुलक्षणसमानलक्षणत्वे सति तदवस्थाविशेषत्वं तत्परिणामत्वम्' यहाँ जडरूप धर्मसे सालक्षण्य सजातीयत्व विवक्षित है अर्थात्—उपादानत्वरूपसे गृहीत जो वस्तु है उसके जडरूप धर्मसे सजातीय उपादानकी अन्य अवस्था परिणाम होगी, मृत्तिकाके परिणाम घटमें यह घटता है—उपादानभूत वस्तु है मृत्तिका और उसकी अन्य अवस्था है—घट, इन उपादान और उपादेयमें जडत्वरूप धर्मके अस्तित्वसे सजातीयता है । ब्रह्मके विवर्त जगत्में, चेतनत्वके न होनेसे, ब्रह्मरूप-उपादानसजातीयताका अभाव है, अतः ब्रह्मके विवर्त जगत्में परिणामका लक्षण नहीं गया, इसलिए अतिव्याप्ति दोष नहीं है । मृत्तिकामें घटके परिणामत्वका वारण करनेके अभिप्रायसे विशेष्य दलका प्रवेश है और प्रपञ्चमें संवित्का परिणामत्व न हो, अतः सत्यन्त विशेषण है, यह समझना चाहिए ।
विवर्तका लक्षण होगा—'उपादानत्वाभिमतवस्तुविलक्षणत्वे सति तदवस्थाविशेषत्वम्' अर्थात् उपादानत्वरूपसे परिगृहीत वस्तुसे विलक्षण होकर उस उपादानरूप वस्तुका अवस्थाविशेष विवर्त है, यहाँ चित्त्व और जडत्व रूप धर्मोंसे विलक्षणता विवक्षित है । शुक्ति-रजतमें, जो शुक्त्यवच्छिन्न चैतन्यका विवर्त है, उक्त लक्षणका समन्वय भली भांति होता है, शुक्त्यवच्छिन्न चैतन्य ही अविद्याके समवधानसे रजताकारसे विवर्तभावको प्राप्त होता है, अतः चैतन्यसे रजत अवश्य विलक्षण हुआ, क्योंकि चैतन्यमें चित्त्वधर्म है और रजतमें जडत्व है, इसी प्रकार ब्रह्म और जगत्में भी चित्त्व और जडत्वसे वैलक्षण्य होनेसे ब्रह्मके विवर्त जगत्में भी लक्षणसमन्वय हो जायगा । चैतन्यमें जडविवर्तत्वके परिहारके लिए विशेष्यदल है और मृत्परिणाम घट आदिमें मृद्विवर्तत्वके निराकरणके लिए विशेषणांश है ।