भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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६२ सिद्धान्तलेशसंग्रह [ प्रथम परिच्छेद

सङ्क्षेपशारीरकानुसारिणः केचिदाहुः—शुद्धमेवोपादानम्, जन्मादिसूत्र-तद्भाष्ययोरुपादानत्वस्य ज्ञेयब्रह्मलक्षणत्वोक्तेः।

शुद्ध ब्रह्म है या ईश्वररूप ब्रह्म है अथवा जीवरूप ब्रह्म है ? * । इस प्रश्नके उत्तरमें संक्षेपशारीरकके मतमें श्रद्धा रखनेवाले कुछ लोग कहते हैं कि शुद्ध ब्रह्म † ही उपादान है, क्योंकि 'जन्माद्यस्य यतः' इस सूत्रमें


* शुद्ध ब्रह्म उपादान कारण है, इस विषयमें संक्षेपशारीरकमें यों श्लोक मिलता है— निमित्तं च योनिश्च यत्कारणं तत् परंब्रह्म सर्वस्य जन्मादिभाजः। इति स्पष्टमाचष्ट एषा श्रुतिर्नः कथं सिद्धवलक्षणं सिद्धिवान्धम्॥ [सं०शा०अ०१ श्लो० ५५३] इस श्लोकका अर्थ है—सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और लयके प्रति उपादान और निमित्तभूत जो कारण है, वह परब्रह्म—शुद्धब्रह्म ही है, ऐसा 'यतो वा' इत्यादि श्रुति स्पष्टरूपसे कहती है अर्थात् यद्यपि ऐसा कारण लोकमें प्रसिद्ध नहीं है, तथापि जगज्जन्म आदिके उपादानरूपसे अपूर्व ब्रह्मका श्रुतिप्रतिपादन करती है, अतः यह लक्षणस्वरूपका असाधक किसी रूपसे भी नहीं होगा। इससे यह ज्ञात होता है कि संक्षेपशारीरकके सिद्धान्तसे शुद्ध ब्रह्म ही जगत्का उपादान माना गया है। और 'तद् ब्रह्म' इसके सान्निध्यसे 'यतो वा' इत्यादिसे जगत्के कारणत्वरूपसे प्रतिपादित ब्रह्म ही लेना चाहिए यह 'लोकप्रसिद्धार्थपदान्तराणाम्' (सं० शा० अ० १ श्लो० २९०) इत्यादि श्लोकमें विशेष स्पष्ट शब्दोंसे कहा गया है, अतः अधिक विषय वहींसे जानना चाहिए।

† यहाँ आदिशब्दसे 'सोऽकामयत' (उस ब्रह्माने इच्छा की प्रजारूपमें अनेक होऊँ) 'यः सर्वज्ञः सर्ववित्' (जो सर्वज्ञ है विशेषरूपसे ज्ञानवान् है) इत्यादि अनेक श्रुतियोंका उद्धरण करना चाहिए। भाव यह है कि यदि शुद्ध ब्रह्म जगत्के प्रति उपादान है, तो उक्त वाक्य, जो ईश्वरके कारणत्वका प्रतिपादन करते हैं, अप्रमाण होंगे, क्योंकि शुद्ध ब्रह्ममें इच्छा और ज्ञानक्रियाकी कर्तृता नहीं हो सकती है, इसलिए शुद्ध ब्रह्म जगत्का उपादान नहीं है, यह श्रुतिसे प्रतीत होता है, परन्तु ईश्वररूप ब्रह्म जगत्का कारण प्रतीत होता है, इसपर संक्षेपशारीरककारके अनुयायी कहते हैं कि उक्त वाक्योंमें कहे गये शबलवाची आत्मशब्दकी शुद्धमें लक्षणा करते हैं, अतः उन वाक्योंसे भी शुद्ध ब्रह्म ही बोधित होता है। इस कल्पनामें केवल हेतु है—'जन्माद्यस्य यतः' यह सूत्र और इसका भाष्य। 'जन्माद्यस्य यतः' इस सूत्रका अर्थ है—समस्त जगत्के उत्पत्ति, स्थिति और लय जिससे होते हैं, वह ब्रह्म है। है, इस मतके पक्षपातियोंका कहना यह है कि 'अथातो ब्रह्मजिज्ञासा' (साधनसम्पत्तियुक्त होनेके अनन्तर ब्रह्मसम्बन्धी विचार करना चाहिए) इस सूत्रमें ज्ञेयरूपसे उसी ब्रह्मकी प्रतिज्ञा की गई है, जो निर्गुण सच्चिदानन्दरूप है, अतः 'जन्माद्यस्य यतः' सूत्रसे निर्गुण ब्रह्मका

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