सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 98, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ें७० | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद
विवरणे च प्रतिकर्मव्यवस्थायां ब्रह्मचैतन्यस्योपादानतया घटादिसङ्गित्त्वम्, जीवचैतन्यस्य तदसङ्गित्त्वेऽप्यन्तःकरणादिसङ्गित्त्वं च वर्णितमित्याहुः ॥
लाया गया है । और विवरणमें भी प्रतिकर्मव्यवस्थाके प्रतिपादक † ग्रन्थमें ब्रह्मके उपादान होनेसे ब्रह्मचैतन्यका घटके साथ तादात्म्य है, और घटादिके प्रति उपादान न होनेसे जीवका घटादिके साथ तादात्म्य न रहनेपर भी अन्तःकरण आदिके साथ जीवकी सङ्गिता—तादात्म्य है' इस प्रकार वर्णन किया गया है ।
श्रित मायाके ही परिणाम हैं । अतः उनके प्रति ईश्वर ही उपादान क्यों न माना जाय ? इस प्रकारकी शङ्काका परिहार 'तथापि' इत्यादिसे किया गया है—'अहं काणः' ( मैं काना हूँ ) 'अहं कर्ता', ( मैं कर्ता हूँ ) 'अहं मूकः', ( मैं मूक हूँ ) और 'अहं स्थूलः' ( मैं स्थूल हूँ ) इत्यादि रूपसे शरीरके अन्दर रहनेवाले अन्तःकरण आदिका जीवके साथ तादात्म्य प्रतीत होता है, वह तभी उपपन्न हो सकता है, जब उनका जीवमें अध्यास माना जाय, ऐसा माननेपर तदधिष्ठानत्वरूप उपादानत्व भी जीवमें ही है।
† प्रतिकर्म-व्यवस्था—जीवके प्रति विषयव्यवस्थाका दिग्दर्शन करानेवाला विवरणग्रन्थका प्रकरण । माया और अविद्याका अभेद माननेमें विवरणकारने 'अत्र केचिदाहुः—अतोऽविद्यामयं वक्तव्यं न मायामयमिति' इत्यादि ग्रन्थसे लेकर 'इति युक्तं मायामयम्' यहाँ तक अनेक युक्तियों और प्रमाणोंका उपन्यास किया है। (पृ० २०७ कल० मुद्रित भामत्यादिटीकानव-कोपेत शाङ्करभाष्य) जानकारीके लिए उसमें से कुछ सारांश यहांपर देते हैं—माया और अविद्याका अभेद नहीं मान सकते, क्योंकि माया अपने आश्रयको मुग्ध नहीं करती और कर्ताकी इच्छाके अनुसार अनुवर्तन करती है। अविद्या वैसी नहीं है अर्थात् स्वाश्रयको मुग्ध करती हुई कर्ताकी इच्छाके विरुद्ध प्रवृत्त होती है। और लोकमें अविद्या तथा मायाका अन्योन्य भेद प्रसिद्ध है ? इस प्रश्नके उत्तरमें विवरणकार कहते हैं कि इनका भेद हम लक्षणके भेदसे या व्यवहारके भेदसे नहीं कर सकते हैं, क्योंकि अनिर्वचनीयतया तत्त्वावभासप्रतिबन्ध विपर्यायावभासरूप लक्षण माया और अविद्यामें सामान्यरूपसे रहता ही है (लक्षणार्थ यह हुआ कि अनिर्वचनीय होकर यथार्थ वस्तुके परिज्ञानमें प्रतिबन्ध करे और विपरीत वस्तुका भान करे उसे अविद्या या माया कहते हैं)। और मायाशब्दका मन्त्र या औषध आदि सत्य वस्तुमें प्रयोग होता है, यह बात नहीं है, क्योंकि मिथ्यारूपसे देखे जानेवाली वस्तुमें भी माया शब्दका प्रयोग होता है। और समीपस्थ पुरुषको मन्त्र आदिका परिज्ञान भी नहीं है, अधिक क्या कहा जाय ? मन्त्र आदिमें मायाशब्दका प्रयोग भी तो लोकमें देखा नहीं जाता और 'मायां तु प्रकृतिम्' (मायाको प्रकृति जानो) इस श्रुतिमें मायाशब्दका प्रयोग प्रकृतिमें है। अतः प्रकृतिभूत माया और अविद्याके लिए एक ही लक्षण अवगत होता है। माया अपने आश्रयमें मोह नहीं करती और अविद्या करती है, इस प्रकार जो लक्षण-भेद कहा गया है, वह भी युक्त नहीं है, क्योंकि यदि मायाका आश्रय द्रष्टा माना जाय, तो वह मुग्ध होता ही है और यदि