भारतकोश
सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा

स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

पृष्ठ 109, कुल 190 में से

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सोलहवीं पुतली १६. ( १०७ ) थालोंमें रख और चार घोड़े खासे लेकर राजाके नगरको चला और वहांसे खटोला जो लेगया था, वहभी फेर देन जब द्वारेपर पहुंचा तब द्वारपालसे कहा-कि, महाराजको मेरी खबर दो. तब द्वारपालोंने राजाको जाकर कहा. राजाने खबर सुन उसे बुला लिया और जो कुछ वह लेगयाथा जाकर उसने राजाकी भेंट किया. और कहा-महाराज ! आपके पुण्यप्रतापसे सब काम अच्छा हुवा. अब इस दासकी भेंट आपको कबूल करनी चाहिये. तब राजा सुन हँसकर बोला कि, मेरा यह स्वभाव है कि, दी हुई चीज मैं फेर नहीं लेता ! यह खलोटा मैने तुझको दिया. और जो कुछ तू तुहफे-लाया है यह सब तुहफे और लाख रुपये अपने खजानेसे मँगवाया और कहा कि, ये हमने तेरे बेटेको दिये. इस वास्ते कि, इसकी शादी हुई है गरज ये सब कुछ इनायत करके मानदै उसे रुखसत किया. वह प्रसन्न हो अपने घरको आया. इतनी बात कह वह पुतली बोली-सुन राजा भोज ! राजा बीरविक्रमादित्यकी बराबरी इंद्रभी नहीं कर सकता था. और तुम तो किस गिनतीमें हो ? जो तूने अपना मन बढ़ाया है. इससे तू बाज आ. इन बातोंमें वहभी दिन गुजर गया. तब राजा महलमें दाखिल हुआ. रात जिस तिस तरह गुजरगई. फिर जब सुबह होगई तब राजा सिंहासनपर बैठनेका इरादा करके वहां आगया. तब सत्यवती

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