भारतकोश
सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा

स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

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( १० ) सिंहासनबत्तीसी.

उसने चाहा कि उसपर रक्खें, इतनेमें ये पुतलियां खिलाखिला- कर हँसीं ओर सबने यह देखा. राजा अपने मनमें जरा रुककर 'वेनिहायत शरमिंदा हो कुछ दहशत खाई. कुछ उसे अचंभा हुआ कि ये बेजान पुतलियां जानदार क्योंकर हुईं ? गश खाकर गजबमे आकर पाव उधरसे खैंचलिया, और पुतलियोंसे कहने लगा कि, तुमने क्या देखी ? ओर क्यों हँसी ? ये सब बात मुझसे बयान करो. क्या मैं बली गजाका बेटा यशस्वी नहीं ? या क्षत्रियोंमें कायर हूं ? या नामर्द हूं ? या बेरहम हूं ? या ओर राजा मेरे हुकममें नहीं ? या मैं पंडित नहीं ? या मेरे यहां पद्मिनी नारी नहीं ? या मैं राजनीति नहीं जानता ? या मैं किसीकी मजलिसमे नींच होकर बैठा ? फिर किस बातमें मैं नालायक हूं ? मेरे दिलमें शंक पडा है सो मुझे तुम बताओ ! ये बात राजाके मुखसे सुनकर उनमेंसे रत्नमंजरी नामक--

पहली पुतली

बोली:--हे राजा, दिल लगाकर मेरी बात सुनो और यह किस्सा मैं तुमसे बयान करता हूं. तुम गुणग्राहक और कदरदान हो ! जो तुमने बातें कहीं सो सब दुरुस्त है सूर्यसेभी तुम्हारे तेजके आगकी ज्वाला अधिक है पर उतना गर्व मत करो. पुरानी कथा सुनो इससंसारका अंत नहीं. भगवान्‌ने