सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)
पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा
स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( १६२ ) सिंहासनबत्तीसी.
तब राजाने छहोंका शिर काट उस गुंफामें डाला और उसका मुँह बंद कर चला २ मंदिरमें आया. और आतेही नगरमें ढँढोरा फिरा दिया कि जितने ब्राह्मण और ब्राह्मणियां और ब्राह्म- णोंकी कन्या हैं वे सब यहां आनकर हाजिर होवें. यह सुनकर सब हाजिर हुई जितने रानियोंके गहने और वस्त्र थे सब ब्राह्मणियोंको पहनाये. और एक एक ब्राह्मणको एक एक गांव वृत्ति करदिया. और जितनी कन्या थीं उनको दान दहेज़ दे व्याह कर दिया. और आप राजकाज करने लगा. इतनी बात कह पुतली समझाने लगी कि, सुन राजा भोज ! तू बड़ा पंडित है पर इस आसनपर वह बैठेगा, जो विक्रमादित्यके समान होगा. तब वह साअत गुजर गई. राजाभी वहांसे उठकर अपने मकानको गया. रातको इसी सोचमें पडा रहा. दूसरे दिन सुबहको फिर सिंहासनके पास आकर चढ़नेके तयार हुआ तब जयलक्ष्मी-
पचीसवीं पुतली-
बोली-सुन, राजा भोज ! एक दिनकी बात मैं तेरे आगे कहतीहूं एक भाट निपट दरिद्री खररावहक था. सब पृथ्वीके राजाओंके पास फिर आयाथा. और एक कौ-