भारतकोश
सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा

स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

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पृष्ठ 164

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( १६४ ) सिंहासनबत्तीसी. अब तुम्हें याचने आयाहूं, मेरा मनोरथ पूर्ण करदो. मैंने संसारमें फिरकर खूब देखा कि, सिवाय तुम्हारे मेरी आशाका पुजानेवाला और और कोई नहीं. तब हँसकर राजाने कहा कि, तू अपना मतलब सब मेरे आगे प्रकाश करके कह तो मैं तेरी कामना पूरी करूं. भाटने कहा-यों मुझे अपने कर्मका भरोसा नहीं आप बचन दीजिये तो मैं खातिरजमासे कहूं. तब राजाने बचन दिया. भाट बोला-महाराज ! मुझे मुंहमांगा दान दीजिये, मेरी पुत्रीकी शादी करदो बारह बरसकी कन्या मेरे घरमें बैठी है, इस लिये मैं आपके पारा याचने आया हूं, यह सुन राजाने हँसकर मंत्रीसे कहा कि, जो यह मांगे वह इसे दो. फिर भाटने कहा-महाराज ! जो कुछ आपको देना है सो अपने सम्मुख मँगा- कर दीजिये मुझे इस संसारमें अब किसीका इतबार नही. राजाने दश लाख रुपये रोक और हीरे, लाल, मोती, सोने, रूपेके गहने था ल भरकर दिये. और वह ले आशीश दे अपने घरमें गया. जो कुछ लाया था सो सब ब्याहमें लगाया और राजाने उसके पीछे जासूद कर दिये थे कि तुम देखो कि, 'यह धनको लेजाकर क्या करता है,' ? इसकी खबर ठीक मुझे लाकर दो. जब शादी कर चुका और उसके पास एक दिनेके खानेको कुछ न रहा तब उन हलकारोंने जाकर राजाको खबर दी कि, महाराज ! उस भाटने ऐसा ब्याह बेटीका किया कि इस कलियुगमें कोई और करसकता नहीं. जो कुछ वो आपके पाससे धन दौलत लेगया