भारतकोश
सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा

स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

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( १७० ) सिंहासनबत्तीसी.

कुछ भरोसा नहीं और मरण साथ लग रहा है. दुःख सुखभी मनुष्यके साथ हैं और पापपुण्यभी रहते हैं. नि- र्गुण और सगुण ज्ञानभी घटमें रहता है पर एक ब्रह्मही अलग है. इस वास्ते मैं तुझसे कहतीहूं-ऐ भूपाल ! संसारमे जिसकी कीर्ति रह जाती है सोही अमर है. जो मैंने तुझे कहा कि, मन वचन कर्म कर तू सच जान. वह दिन तो यों गुजर गया, राजा नाउ- म्मेद होकर अपने मकानको फिर गया. सुबह होतेही हाथ, मुंह धो, स्नान पूजा कर फिर वहीं आन मौजूद हुआ और जितने राजाके सभामें लोग थे वे भी सब हाजिर हुए राजाने अपने लोगों कहा कि-पुतलिया तो बाते झूठ झूठ बना मेरे आगे कहती है अब मैं इनकी बाते न सुनूंगा और इस सिंहासनपर बैठूंगा. यह अपने लोगोंसे बाते करता था कि-जगज्ज्योति नामावाली -- सताईसवीं पुतली- बोली-सुन राजा भोज ! एक दिन राजा बीरविक्रमादित्य अपनी सभामें बैठा था कि, उसमें प्रसंग निकला. उसमे- कोई बोल उठा कि, आज राजा इंद्रके बराबर कोई राजा नहीं है, क्योंकि वह देवलोकका राज करता है ! यह बात राजाने सुन किसीसे कुछ न कहा और बैतालोंको बुलाकर कहा कि, मुझे इंद्रपुरीको ले चलो. बैताल तुरंत के उडे और एकदममें के