भारतकोश
सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा

स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

पृष्ठ 176, कुल 190 में से

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पृष्ठ 176

( १७६ ) सिंहासनबत्तीसी. दान और साहस किया था. पर तेरासा उनका न था और उन्होंनेभी मेरे दर्शनकी बहुत अभिलाषा की थी. पर मैंने दर्शन किसीको न दिया. तू एक द्वीपका राजा किस गिनतीमें है ? पर तपस्या बडी जोरावर है जो तुझे मेरा दर्शन मिला. तब राजा विक्रम फिर हाथ जोडकर कहने लगा कि, हे महा- राज ! जो आपने कहा सो सब सच है. और मैंने निश्चयकर अपने जीमें माना कि, आपने मुझपर बडी कृपा कर दर्शन दिया. और दया कर इस भवसागरसे पार किया. फिर राजा बलिने कहा कि, राजा विक्रम ! तू अब यहांसे विदा हो और जाकर अपना राज कर. विदाका नाम विक्रमने सुनकर बडा खेद किया. इतनेमें राजा बलिने एक अच्छा लाल मँगवाकर राजा विक्रमको प्रसाद दिया. और उसका जो गुण था सो बताया कि, जो तू इससे मांगेगा वह सब यह देगा. विक्रमने हाथ जोड लिया और राजा बलिको दंडवत् कर वहांसे निकला, और बैतालोंको बुलाकर सवार हो अपने नग- रको आया. जब नगरके निकट आन पहुँचा तब एक नदीके किनारे देखे तो एक स्त्रीका खाविंद मर गया है उसे जलाकर खडीहुई वह डकरा डकरा रोती है और कहती है कि, अब इस संसारमें मेरा मालिक कोई नहीं है और न मेरेपास कुछ माया है अब किस तरहसे तेरा श्राद्ध करूंगी और पंचोंको क्या दूंगी. ? इसका कूक मार मार रोनेका अवाज राजाने सुना