सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)
पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा
स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१८० सिंघासनबत्तीसी. सब कुछ है. अन्न, धन, हाथी, घोडे किसी चीजकी कमताई नहीं. पर एक वस्तु मात्र मांगनेके लिये मैं आपके पास आया हूं जो कृपाकर दीजिये तो मैं मांगूं. यह सुन योगीने कहा कि, राजा ! जो तू मांगेगा सो मैं दूंगा. यह बात सुनतेही विक्रमने कहा-महाराज ! यह मंदिर मुझे दीजिये. योगीने सुन कुछ बिलंब न किया. तुर्त वह मंदिर राजाको दिया. और अपना योगरूप धर वहांसे तीर्थब्रत करनेको गया. राजाने जब वह महल पाया तब प्रसन्न हो गद्दीपर जाकर बैठा और वे सब रंडियां जैसे योगीके आगे गातीथी वैसेही तहासे राजाके पास गाने लगी राजाभी उस मंदिरमें खुशीसे रहने लगा. वहा अनेक अनेक प्रकारके संभोग करने लगा. इतनी बात कह वैदेही नाम पुतली बोली कि, सुन राजा भोज ! इस रीतिसे राजा विक्रमादित्य तो वहा बैठकर आनंद करने लगा और योगी तीर्थ तीर्थ फिरकर रहता था. और जो कोई सिद्ध मिलता था उससे अपना दुःख कहता था- इस तरहसे किसी और तीर्थमें जाकर पहुंचा आर वहां एक यतीसे अपने जीके दुःखका ब्योरा सब कहने लगा. उसने उसको कहा कि तू अपने स्थानको जा और भेष धरके राजा विक्रमसे जाकर सवाल कर वह तो बडा धर्मात्मा है. जभी तू वह मकान मांगेगा तभी तुझे हवा ले कर देगा. तू आपके मनमें चिंता मत कर. यहु योगी उसकी सीख मान एक अति बूढे ब्राह्मणका भेष धर उस मंदिरके निकट आन पहुँचा. और उसके द्वारपर जा ताली दी. तालीकी