सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)
पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा
स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)
पृष्ठ 24, कुल 190 में से
संदर्भ में पढ़ेंयहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का देवनागरी लिप्यंतरण दिया गया है:
कहा-यहां बैठो और मैं अपने राजाको तुम्हारे आनेकी खबर दूं. यह बात राजासे कहकर लूनबरन अपने राजाके मंदिरमें गया उसको प्रणाम किया. और सब समाचार और अपनी हकीकतसमेत राजाका अहवाल कहने लगा-महाराज ? गंधर्व- सेनका बेटा विक्रम आपके दर्शनके लिये आया है. यह बात बाहुबल राजाने सुनकर उसको तुरंत अंदर बुलाया. तब लूनब- रन राजा विक्रमको लाया और अपने राजासे मिलाया. राजा उससे उठकर मिला और आदर करके आधे आसनपर बिठाया और क्षेम कुशल पूछी बाद उसके रहनेके लिये मकान बताया राजा उठकर उस मकानमें आया, वहा रहने लगा. जब दस पांच दिन बीतगये तब दीवानसे राजा विक्रमने कहा-हमें तुम विदा करवा दो, तो हम अपने स्थानको जावें तब मंत्री कहने लगा-हमारे राजाका यह स्वभाव है कि जो उनसे मिलनेको आताहै उसे अपना रुखसत नहीं करते, तुम रुखसत मांगो और जिस बातकी ख्वाहिश हो सो कहो, अपने जीमें कुछ शर्म न करो. तब राजा बोला-मुझे कुछ नहीं चाहिये. जो कोई जो बर चाहे सो मुझसे ले. तब दीवान बोला-राजा ! यह हमारी बात सुनो. इस राजाके घरमें एक सिंहासन है सो वह सिंहासन पहले महादेवजीने राजा इंद्रको दियाथा और इंद्र राजाने इसको दिया. उस सिंहासनमें ऐसा गुण है कि, जो उसपर बैठे