भारतकोश
सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा

स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

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( २६ ) सिंहासनबत्तीसी. रिको दिया और राज पाटपर उसे बिठा आप राजकाज सब धन दौलत छोड कंथा पहन भस्म लगा संन्यासी बनकर जंग- लको निकल गया और उत्तरखंडमें जाकर योग साधने लगा. उस शहरके जंगलमे एक ब्राह्मण तपस्या करताथा. धुवा पीके रहता था और भूख प्यासके दुःख सहताथा. ब्राह्मणकी तपस्या देखके देवता खुश हुए. और उसको बर देने लगे और उसने न लिया तब आकाशवाणी हुई कि, हम अमृत भेजते हैं सो तू ले. एक देवता आदमीकी सूरतमें आकार उसे फल दे यह कहगया कि, जो इसको तू खावेगा, तो चिरंजीव होगा. फल लेकर वह तुरंत चला खुशी खुशीसे अपने घरको आया. और ब्राह्म णीके हाथमें वह फल दिया, और, कहा कि, आज देवताओने अमृतफल देकर कहा जो इसे खावेगा सो अमर हो जावेगा. यह बात सुनकर ब्राह्मणी व्याकुल हो रोने लगी. फिर बोली- यह अब दुःख आया. पाप हम किस तरहसे काटेंगे ? और हमेशह भीख क्यों कर माँगें ? खाल मास सब हाडमे मिल जायगा ऐसे जीनेसे मरजाना बेहतर है. मर जानेवालेको इतना दुःख नहीं होता, इस फलको वह खावेगा जो हमेशा उठावेगा इससे योग्य, यह है कि, तुम इस फलको ले जाकर राजाको दो; और उनसे कुछ धन लो. यह सुनकर ब्राह्मण अपने जीमें समझा, यह सच है, इस संसारमें इतना जंजाल कौन है इसी तरह आपसमें बाते सलाहकी करके ब्राह्मण वहांसे उठ

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