भारतकोश
सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा

स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

पृष्ठ 32, कुल 190 में से

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दूसरी पुतली ( २९ )

कहा कि, मुझे कोतवालने दिया है. यह सुनकर उसने समझ लिया कि, रानीने बुरा काम किया उसे कुछ रुपये देकर बिदा किया और आप भौंचक रहगया. फिर समझकर कहने लगा-मैने तो मन अपना रानीको दिया और उसने अपना दिल कोतवालको. मनका भेदी कोई न मिला ऐसे जीनेको और मेरी बुद्धिको धिक्कार है, जो मैं फिर राज करूँ ! फिर उस रानीके ताई और लअनत उस कोतवालको और उस वेश्याको और कामदेवको धिक्कार है, जो यह मति संसारकी करता है कि, जिससे संसार अहमद हो जाता है. बाद उस फलको लिये हुये महलमें गया और अपने चित्तमें कहने लगा-यह तन, मन, धन, जी सब चंचल है. और यह संसार जानहार है. इसमें कोई कायम न होगा. जबहीं पैदा हुआ तबहीं कालने खाया और जब मरता है तो कुछ साथ नहीं लेजाता. और मेरा मेरा करके जन्म गँवाता है, सुखके सब साथी है. और दुःख कोई नहीं बांटता. यह संसार जो है सो समुद्र है और माया उसका जल है. ममता मछली है. ऐसा बधिक कोई न मिला कि जो इसको मारके खाय. यह विचार करता हुवा रानीके पास गया. और उसे पूछा तूने वह फल क्या किया ? तब वह बोली-महाराज ! मैंने खाया. सुनकर राजाने वही फल रानीको दिखाया तब वह देखकर जड हो गई. तब राजा उस फलको लेकर बाहर आया और धोकर

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