सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)
पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा
स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीः सिंहासनबत्तीसी [ए] क राजाभोज उज्जैन नगरीका राजा महाबली और बड़ा धनी यशस्वी और धर्मात्मा था, जितने लोग उसके राज्य में बसते थे सो सब चैन करते थे, राजा राजप्रजा सुखी, किसी को कोई किसी तरहका दुःख नहीं दे सक्ता था, यह न्याय उसके यहां था, जो बाघ, बकरी, एक घाटका पानी पीतेथे, यह और सब उसके आसरेमे जीते, परमेश्वरने जबसे उसे दुनियाँके परदेपर उतारा तबसे वे सहारोंका किया सहारा, और रूप उसका देखकर चौदशकी रात के चांदको चकाचौंधी पड़ी, वह अतिबड़ा चतुर सुघर और गुणी था, अति अच्छी अच्छी जितनी बातें थीं सो सब उसमे समाई थीं, भलाई उसकी जगत्में मशहूर थी, और नगरी उसकी इसतरह बसती थी कि, जो चिप्पा रखनेको जगह नहीं मिलती थी, वह हरा भरा नगर, शादियां घर घर, नये तोरके अच्छे अच्छे मकान बनेहुये, चौपड़का बाजार दरमियान, नहर बहतीहुई, उत्तम दूकानोंमें एक एक दूकानदार सराफ, बजाज, सौदागर