भारतकोश
सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा

स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

पृष्ठ 51, कुल 190 में से

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( ४८ ) सिंहासनबत्तीसी. हाथमें लोगे तो तुम सबको देखोगे और तुम्हें कोई न देखेगा. चौथे पहर रातको मानिंद कालके यह होजायगी इसके डरसे कोई दुस्मन तुम्हारे पास आ न सकेगा. यह बात सुनकर योगीने राजाको रुखसत किया. राजा जब उज्जैन नगरीके पास जाकर पहुँचा तब उधरसे एक ब्राह्मण और एक भाटको आते देखा और जब नजदीक जाकर पहुँचे तो उन्होंने आशीर्वाद देकर कहा महा- राज ! आपके द्वारपर हमने बहुत दिन सेवा की पर हमारा भाग्यही ऐसा था कि कुछ इसका फल न मिला. तब राजाने सुनतेही ब्राह्मणको छड़ी दी और भाटको माला दी. और उसका सब भेद कह दिया. तब आशीर्वाद देकर वे दोनों कहने लगे, महा- राज ! इस समयमें तुम राजा कर्ण हो. तुम्हारे बराबर दानी आज पृथ्वीमें दूसरा और नहीं. यह कहा और दोनों बिदा होकर गये. राजाभी अपने स्थानको गया. तब दीवान प्रधान सब आनकर हाजिर हुए. जहरकी तमाम रंयत खुश हुई और वे दोनों झगड़लूनी यह खबर सुन तूर्त आकर राजाके सामने खड़े रहे और कहा—महाराज ! आपने जो छ महीनेका करार कियाथा सो बीत गया अब हमारा न्याय करदीजिये. यह सुन कर राजा बोला कि-बिना बल कर्म कुछ कामका नहीं और बिना कर्म बल काम नहीं आता, इससे वे दोनों बराबर हैं इसको सुन संतोषकर बाद दोनों अपने अपण घरको गये. ऐ

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