सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)
पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा
स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ४ ) सिंहासनबत्तीसी आप-ऐसा सुघर था जो बात बातमें मोती पिरोता और नौ किस्म के साहिब कमाल जैसे नौरत्न उसकी मजलिसमें हाजिर रहतेथे. राजा इंद्र उसकी सभाको देखकर रश्ककी आगसे जल- ताथा. और उसका अखाड़ा हसरतके मारे हाथ मलताथा. रंडो मर्द उसकी सूरतपर दिवाने थे, जिसने एकबार उसे देखा वो आपेमें न रहा, जिसने उसकी खूबसूरतीका बयान सुना बेचैन हुआ जो बनके मदमे सरशार मोहनका अवतार नौजवान चतुर साहिबी तदबीर था. उसकी शेर और तमाशेको शहरके किनारे बागखानोंमे कोसोंतक क्यारिया बनाई थीं और हररंगके फूलोकी बहोरे दि- खाईंथीं और इनके बराबर एक खेतमें किसी मुराईने खीरे वोएथे जब ये उगे बेलें तमाम. खेतमे फैलगई और खूब हरियाली हुई, जर्द जर्द फुला और तैयारीपर आया तब उस खेतवालेने रखवालीको एक मचान तजरीब किया. देखा दर मियान उस खेतके एक चौका जमीनका खाली रहताहै कि, न कुछ उसमे जामा है, न उपजा है. मुराईने रखवाली करनेको इर्द गिर्द झाड़े लगाकर ऊपर एक मचानसा बांधा उसपर बैठकर चारोंतरफ निगाह करतेही कहने लगा कि-कोई है ? इसी बखत राजा भोजका गढ़से पकड़ लाये ओर सजाको पहुँचावे. राजाके नोकरोंमेंसे एकने इस बातको सुनतेही टांग पकड़कर उसे नीचे गिरादिया और मुँहही मुँह थपेटाँसे मार मार सारा मुँह सुझादिया. कान