भारतकोश
सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा

स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

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चौदहवीं पुतली १४. (९१) स्वर्गको रवाना कर देवताओंको नौता भेज बुलाया और एक ब्राह्मणको बुलाकर कहा कि-तुम समुद्रके पास जाकर हमारा दंडवत कहो और निवेदन करो कि-राजा विक्रमादित्यने यज्ञका आरंभ किया है और आपको बहुत नम्रता कर बुलाया है. वह ब्राह्मण तुरंत वहाँसे चला और कितनेएक दिनोंमें साग- रके तीरपर जा पहुँचा और वहां देखता तौ क्या है कि, न कोई मनुष्य है और न कोई वहां पशु पक्षी है. केवल जलही जल नजर आता है. तब उस ब्राह्मण अपने जीमें चिंता कर कहने लगा कि-राजाका संदेश किससे कहूं? यहा तो कोई जीव दिखाई नहीं देता उधर है तो जलही जल है. ऐसा अपने मनमें विचारकर वह पुकारा कि-राजा वीरविक्रमादित्यका नौता मैं दिये आता हूँ और तुम जल्दी पहुँचना. इतना कह वहांसे वह जब चला तब प्रत्यक्ष एक बूढ़े ब्राह्मणके रूप समुद्र नजर आया. और उसने पूछा कि-बीर विक्रमादित्यने हमें किसवास्ते बुलाया है? तब उसने कहा कि-राजाके यहां यज्ञ है ! और तुम्हें जरूर बुलाया है तब समुद्र बोला कि-मैं चलूंगा पर मेरे चलनेसे पानी जो यहांसे बढ़ेगा तौ कई नगर डूब जावेंगे इसलिये मेरी तरफसे तुम राजाको विनती कर कहना कि, मेरे न आनेका कुछ पछताव न करना. मैं इस सबबसे पहुँच नहीं सक्ता. तब समुद्रने ब्राह्मणको पाँच लाल दिये और एक घोडा राजाको सौंप दिया, और आप वहीं रहा- तब ब्राह्मण सब-