सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)
पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा
स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ९४ ) सिंहासनबत्तीसी. और कहा-अच्छा चित्रकारको बुलाकर चित्र लिखावो. मंत्रीने उसको बुला भेजा. वह तुर्त आकर हाजिर हुआ और वह कैसा था कि ज्योतिषविद्यामें अति निपुण था. और चित्रकारी विद्यामें भी पंडित था. उसे राजाने कहा कि-रानीकी मूर्त्तिका पट लिख दे जो मैं अपनी नजरमें हमेशा रक्खूं सुन- कर इस शारदापुत्रने मस्तक झुकाके कहा-महाराज ! अच्छा. मैं लिख लाताहू. राजासे रुखसत हो अपने घरको आया. और लिखना आरंभ किया. सो ऐसा कि जानें अभी इंद्रलोकसे अप्सरा उतरी है और उस रानीका जैसा अंग जहां था तैसाही उसने अपनी विद्याके जोरसे लिखा. जब वह तसबीर तैयार हुई तब लेकर राजाके पास गया. और राजाने देखकर बहुत पसंद किया. अंग अंग उसने निरख देखा नखसे शिख तलक गोया सांचेकी ढाली हुईथी. राजाकी दृष्टि देखते देखते दाहनी जांघपर जा पड़ी तो वहां एक तिल देखा तब बहुतसा अपने जीमें घबराया और कहने लगा कि-इसने रानीकी जांघका तिल क्योंकर देखा ? हो न हो रानीसे इसकी मुलाकात है. इस तरह अपने मनमें विचार क्रोधकर दीवानसे कहा कि-इस चित्रकारको तुरत बुलाओ उसने सुन- तेही उसे बुला भेजा. जाना कि, राजा खुश हुआ है. सो कुछ इनाम देगा. जब वह आनकर राजाके सन्मुख हुआ तब बधि- कको बुलाकर हुकुम किया कि इसकी गर्दन मारके आँखें