सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)
पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा
स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपंद्रहवीं पुतली १५. (९७) पाप राजाके मारने और वृक्षके काटने, गुरुसे झूठ बोलने और- वन जलाने और विश्वासघात करनेसे, इतनाही होताहै. शरणा- गताको मारने इन सबका पाप महापाप है. और यह पाप किसी तरहसे छूटता नहीं. इसने मेरी शरण ली है. क्या हुआ जो एक जी मैने न खाया ? तब बाघ खफा होकर बोला, कि-तूनेमेरा कहा तो न माना इस वास्ते मैभी तुझे जीता न जाने दूंगा. इतनेमें रींछकी बारी तो होगई और राजपुत्र जागया रींछ सोया. वह चौकी देने लगा. इससेभी बाघने वही बात की कि- भाई ! जो मैं कहूं सो तू सुन. भूलकरभी तू इससे मत पतिया सोकर सुबहको जब उठेगा तब अलसाकर तुझे खा जायगा. यह मुझसे कह चुका है कि, सोकर उठूं तो मैं इसे खाजाऊं. इससे यह भला है कि तू पहलेही इस रींछको गिरा दे. जो मैं इसे खाजाऊ और अपनी राहालूं तूंभी सहीह सलामत अपने घरको जा. उसके प्रबोध देनेसे यह बातोंमें आ गया और उस डह- नीको पकड़ ऐसा हिलाया कि जिससे वह रींछ तले गिरपड़े इससे उसकी आँख खुल गई और टहनीसे लिपट कर रह गया. और इससे कहा कि-अय पापी ! जो तूने मुझसे सलूक किया उससे मैंने तेरी जान रक्खी और तू मतिहीन मेरे मारनेको तयार हुआ. अब जो मैं तुझे मार कर खाजाऊं तो तू क्या करेगा ? यह बाते रींछकी सुनतेही इसकी जान सूख गई. और ७