भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1166
  • नागरखण्ड-पूर्वार्ध * | ११३७

रहूँगा। सब दुष्टोंका विनाश करनेवाली सर्वव्यापिनी देवि! आपकी जय हो।

महिषासुरका यह दीन वचन सुनकर देवीको दया आ गयी। वे आकाशमें खड़े हुए देवताओंसे बोलीं—'देवगण! अब मैं क्या करूँ?' देवता बोले—'देवेश्वरि! यदि इस अधम दानवका वध नहीं करोगी, तब तो यह समस्त चराचर प्राणियोंसहित तीनों लोकोंका विनाश कर डालेगा; फिर तो तुम्हारे प्रादुर्भावके निमित्त किया हुआ हमारा सारा परिश्रम व्यर्थ होगा और तुमने भी जो यह युद्ध करनेका सारा कष्ट सहन किया है, इसका भी कोई अच्छा परिणाम नहीं निकलेगा।'

देवीने कहा—देवताओ! न तो मैं इसे मारूँगी और न छोड़ूँगी। सदा इसकी चोटी पकड़कर इसे अपने हाथमें ही रखूँगी।

देवता बोले—महाभागे! तुम्हारा कथन ठीक है, इस समय ऐसा ही करना उचित होगा। जो मनुष्य इस रूपमें स्थित हुई तुम्हारी पूजा करेगा, उसे तुम्हारा दुर्लभ दर्शन प्राप्त होगा। आजसे 'विन्ध्यवासिनीदेवी' के नामसे तुम्हारी ख्याति होगी। आश्विनमासके शुक्ल पक्षमें अष्टमी-नवमी तिथिको जो मनुष्य तुम्हारी भक्तिपूर्वक पूजा करेगा, उसे एक वर्षतक कोई रोग, भय और तिरस्कार आदिकी प्राप्ति नहीं होगी। उसके लिये अकालमृत्यु तथा चोर आदिका उपद्रव भी नहीं रहेगा।

सूतजी कहते हैं—देवतालोग ऐसा कहकर अपने-अपने स्थानको चले गये। इन्द्रने दीर्घकालके बाद त्रिलोकीका अकण्टक राज्य प्राप्त किया। तदनन्तर सब लोग सुखी हो गये। देवता पुनः तीनों लोकोंमें यज्ञभागके भोक्ता हुए। आनर्तदेशमें सुरथ नामसे प्रसिद्ध एक राजा हो गये हैं। उन्होंने उत्तम भक्तिपूर्वक हाटकेश्वरक्षेत्रमें देवीकी स्थापना की है। चैत्रमासके शुक्ल पक्षकी अष्टमी तिथिको जो पुरुष उत्तम भक्तिभावसे यहाँ देवीका दर्शन करता है, वह एक वर्षतक कृतार्थ (पूर्णमनोरथ) होता है।


# केदारक्षेत्रका प्रादुर्भाव तथा वहाँ भगवान् शिवकी आराधनाका माहात्म्य

ऋषियोंने पूछा—सूतजी! हिमालय-प्रदेशवर्ती गंगाद्वारक्षेत्रमें 'केदार' भगवान्‌की स्थिति सुनी जाती है, सो वे वहाँ किस प्रकार प्राप्त हुए?

सूतजीने कहा—महर्षियो! जबतक गरमी और वर्षा रहती है, तबतक तो भगवान् शिव वहीं (हिमालय-प्रदेशके केदारक्षेत्रमें) रहते हैं; किंतु शीतकालमें हाटकेश्वरक्षेत्रमें चले आते हैं। प्राचीन कालमें स्वायम्भुव मन्वन्तरके प्रारम्भसमयकी बात है, हिरण्याक्ष नामसे प्रसिद्ध एक महातेजस्वी दैत्य था। महाबली होनेके साथ ही वह तप और पराक्रमसे भी सम्पन्न था। हिरण्याक्ष आदि दैत्योंने इन्द्रको स्वर्गसे निकाल दिया और स्वयं ही समस्त त्रिलोकीपर अधिकार जमा लिया। राज्यरहित इन्द्रने देवताओंसहित गंगाद्वारमें आकर तपस्या प्रारम्भ की। एक दिन भगवान् शिव महिषका रूप धारणकर तीव्र तपस्या करते हुए इन्द्रके सम्मुख पृथ्वीतलसे निकले और बोले—'सुरश्रेष्ठ! शीघ्र बोलो, मैं इस रूपमें सम्पूर्ण दैत्योंमेंसे किन-किनको जलमें विदीर्ण कर डालूँ (के दारयामि)?'

इन्द्र बोले—प्रभो! हिरण्याक्ष, सुबाहु, वक्त्र-कन्धर, त्रिश्रृंग तथा लोहिताक्ष—इन पाँचोंका वध कीजिये। इनके मरनेपर निश्चय ही सब दैत्य मरे हुएके ही तुल्य हो जायेंगे; अतः अन्यान्य दीन-हीन दैत्योंका नाश करनेसे क्या लाभ है?

इन्द्रके ऐसा कहनेपर भगवान् शिव तुरंत उस स्थानपर गये, जहाँ दानव हिरण्याक्ष विद्यमान था। उस भयानक भैंसेको देखकर सब दानव सब ओरसे उसपर पत्थरों और डंडोंकी बौछार करने लगे। दैत्यों और उनके प्रहारोंकी तनिक भी