भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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८८* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

था। जैसे पहले राजा बलि अत्यन्त बलवान् और अजेय थे, उसी प्रकार राजा वीरवर्मा भी समस्त राजाओंके लिये अजेय हो गया था।'

नारदजीकी कही हुई ये सब बातें सुनकर अर्जुनको बड़ी प्रसन्नता हुई। वे बोले—'मुने! जो ब्राह्मणोंकी इच्छाके अनुसार चलते और ब्राह्मणोंका सदा समादर करते हैं, वे अकुशली कैसे हो सकते हैं? मैं सदा संयम-नियमसे रहकर तीर्थोंमें विचरता हुआ इस तीर्थमें आया हूँ। इससे मेरे हृदयमें बड़ा आनन्द है। तीर्थोंका दर्शन धन्य है! उनमें स्नान करनेका महत्त्व दर्शनसे भी अधिक है, तथा उनके माहात्म्यको सुनना दर्शन और स्नानसे भी बढ़कर है। ऐसा और्व मुनिका कथन है।^१ अतः मैं इस तीर्थके गुणोंका वर्णन सुनना चाहता हूँ।'

नारदजीने कहा—कुन्तीनन्दन! तुम स्वयं गुणी हो, इसलिये गुणोंको पूछते हो। यह तुम्हारे लिये सर्वथा उचित ही है। गुणी पुरुषोंमें ही धर्मसे उत्पन्न होनेवाले गुणोंको सुननेकी इच्छा होनी सम्भव है। साधुपुरुषोंकी आयु प्रतिदिन धर्मकी बातें सुनने तथा धर्म और ईश्वरके कीर्तन करनेमें ही बीतती है। परंतु पापात्मा पुरुषोंकी आयु सदा बुरी चर्चाएँ करनेमें ही व्यर्थ नष्ट होती है^२। इसलिये मैं इस तीर्थके जो बहुत-से गुण हैं, उनका वर्णन करूँगा। अर्जुन! पहलेकी बात है, मैं कपिलजीके पीछे-पीछे तीनों लोकोंमें विचरता हुआ एक दिन ब्रह्मलोकमें गया। वहाँ मैंने लोकपितामह ब्रह्माजीका दर्शन किया और उन्हें प्रणाम करके कपिलदेवजीके साथ प्रसन्नतापूर्वक बैठा। ब्रह्माजीने स्नेहपूर्ण दृष्टिसे मेरी ओर देखकर ही मानो मेरा स्वागत किया था। इसी समय वहाँ कुछ ब्राह्मण पधारे, जो सदा जगत् स्थिति देखनेके लिये लोकहितके उद्देश्यसे भ्रमण करते रहते हैं। वे भी जब प्रणाम करके बैठ गये, तब पितामहने अपनी अमृतमयी दृष्टिसे देखकर उन्हें आनन्दमग्न करते हुए पूछा—'ब्राह्मणो! तुमने कहाँ-कहाँ भ्रमण किया है? क्या-क्या देखा अथवा सुना है? यदि कहीं कोई अद्भुत बात हो तो बताओ।' उनके इस प्रकार पूछनेपर वे सुश्रवा नामवाले ब्राह्मण ब्रह्माजीको मस्तक झुकाकर इस प्रकार बोले—'भगवन्! सर्वज्ञ प्रभुके सामने किसी बातका विज्ञापन करना वैसा ही है, जैसा सूर्यके आगे दीपक दिखाना। फिर भी पुण्यके लिये आपने हमें कुछ कहनेकी आज्ञा दी है, इसलिये अवश्य कुछ निवेदन करना उचित है। कात्यायन नामके एक मुनि थे, जिन्होंने बहुत-से धर्मोंका श्रवण करके उनका सारतत्त्व जाननेकी इच्छासे एक अँगूठेके बलपर खड़े हो सौ वर्षोंतक तपस्या की। तदनन्तर दिव्य आकाशवाणी हुई—'कात्यायन! तुम परम पवित्र सरस्वती नदीके तटपर जाकर सारस्वत मुनिसे पूछो। सारस्वत मुनि धर्मके तत्त्वको जाननेवाले हैं। वे तुम्हें सारभूत धर्मका उपदेश करेंगे।'

'यह सुनकर मुनिवर कात्यायन मुनिश्रेष्ठ सारस्वतके पास गये और भूमिपर मस्तक रखकर उन्हें प्रणाम करके अपने मनकी शंका इस प्रकार पूछने लगे—'महर्षे! कोई सत्यकी प्रशंसा करते हैं, कुछ लोग तप और शौचाचारकी महिमा गाते हैं, कोई सांख्य (ज्ञान)-की सराहना करते हैं, कुछ अन्य लोग योगको महत्त्व देते हैं, कोई क्षमाको श्रेष्ठ बतलाते हैं, कोई इन्द्रिय-संयम और सरलताको तो कोई मौनको सर्वश्रेष्ठ कहते हैं, कोई शास्त्रोंके स्वाध्यायकी तो कोई सम्यक्


१-तीर्थानां दर्शनं धन्यमवगाहस्ततोऽधिकः। माहात्म्यश्रवणं तस्मादित्योर्वो मुनिरब्रवीत्॥
(स्क०पु०, मा० कुमा० २। १७)
२-साधूनां धर्मश्रवणैः कीर्तनैर्याति चान्वहम्। पापानामसदालापैरायुर्याति वृथात्ययम्॥
(स्क०पु०, मा० कुमा० २। २१)