भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 119
९०* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

तपस्यामें कौन दुष्कर है तथा कौन परलोकमें महान् फल देनेवाला है; यह बतलाइये।

सारस्वतने कहा—मुने! इस पृथ्वीपर दानसे बढ़कर अत्यन्त दुष्कर कोई कार्य नहीं है। यह प्रत्यक्ष देखा जाता है। सभी लोग इसके साक्षी हैं। मनुष्य धनके लिये महान् लोभ होनेके कारण अपने प्यारे प्राणोंका भी मोह छोड़कर महाभयंकर समुद्र, जंगल और पहाड़ोंमें प्रवेश कर जाते हैं। दूसरे लोग धनके ही लोभसे सेवा-जैसी निन्दित वृत्तिका आश्रय लेते हैं, जिसे कुत्तेकी वृत्तिके समान त्याज्य माना गया है। कुछ लोग खेतीकी वृत्ति अपनाते हैं, जिसमें प्रायः जीवोंकी हिंसा होती है और स्वयं भी बहुत क्लेश उठाने पड़ते हैं। इस प्रकार जो बड़े दुःखसे उपार्जन किया गया, सैकड़ों आयास-प्रयाससे प्राप्त किया गया, प्राणोंसे भी अधिक प्रिय है, उस धनका त्याग अत्यन्त दुष्कर है। मनुष्य अपने हाथसे उठाकर जो धन दूसरेको देता है, अथवा जिसे वह खा-पीकर भोग लेता है, वही धन वास्तवमें उस धनीका है। मरे हुए मनुष्यके धनसे तो दूसरे लोग मौज करते हैं। जो प्रतिदिन अपने पास आकर याचना करता है, मैं उसे गुरु मानता हूँ; क्योंकि वह नित्यप्रति दर्पणकी भाँति मेरे चित्तका मार्जन करके इसे स्वच्छ बनाता है। दिया जानेवाला धन घटता नहीं, अपितु सदा बढ़ता ही रहता है। ठीक उसी प्रकार, जैसे कुएँसे पानी उलीचनेपर वह शुद्ध और अधिक जलवाला होता है। एक जन्मके सुखके लिये सहस्रों जन्मोंके सुखोंपर पानी नहीं फेरना चाहिये। बुद्धिमान् पुरुष एक ही जन्ममें इतना पुण्य संचय कर लेता है, जो सहस्रों जन्मोंके लिये पर्याप्त होता है। मूर्ख मनुष्य इस लोकमें दरिद्र हो जानेकी आशंकासे अपने धनका दान नहीं करता, परंतु विद्वान् पुरुष परलोकमें दरिद्र न होना पड़े, इस शंकासे यहाँ खुले हाथों धन बाँटता है। जिनका आश्रय ही नाशवान् है, वे मनुष्य धन रखकर क्या करेंगे? जिसके लिये वे धन चाहते हैं, वह शरीर सदा रहनेवाला नहीं है। लोगोंने पहलेसे जो 'नास्ति-नास्ति' (नहीं है, नहीं है) इन दो अक्षरोंका अभ्यास कर रखा है, उसकी जगह यह 'देहि-देहि' (दो-दो) इन दो अक्षरोंका प्रस्ताव विपरीत जान पड़ता है। याचक जन 'देहि' (दीजिये) कहकर याचना नहीं करते, अपितु कृपण मनुष्यको यह समझाते हैं कि 'दान न करनेवालेकी यही (मेरी-जैसी) अवस्था होती है। अतः आप भी ऐसे ही न बनें।' याचक दाताका उपकार करनेके लिये ही उसके सामने 'देहि' (दीजिये) कहकर याचना करता है; क्योंकि दाता तो ऊपरके लोकोंमें जाता है और दान लेनेवाला नीचे ही रह जाता है। जो दान नहीं करते, वे दरिद्र, रोगी, मूर्ख तथा सदा दूसरोंके सेवक होकर दुःखके ही भागी होते हैं। जो धनवान् होकर दान नहीं करता और दरिद्र होकर कष्ट-सहनरूप तपसे दूर भागता है, इन दोनोंको गलेमें बड़ा भारी पत्थर बाँधकर जलमें छोड़ देना चाहिये। सैकड़ों मनुष्योंमें कोई शूरवीर हो सकता है, सहस्रोंमें कोई पण्डित भी मिल सकता है तथा लाखोंमें कोई वक्ता भी निकल सकता है, परंतु इनमें एक भी दाता हो सकता है या नहीं, इसमें सन्देह है। गौ, ब्राह्मण, वेद, सती स्त्री, सत्यवादी पुरुष, लोभहीन तथा दानशील मनुष्य—इन सातोंके द्वारा ही यह पृथ्वी धारण की जाती है।* उशीनर देशके राजा शिवि ब्राह्मणके लिये


* अहन्यहनि याचन्तमहं मन्ये गुरुं तथा। मार्जनं दर्पणस्येव यः करोति दिने दिने॥
दीयमानं हि नायैति भूय एवाभिवर्धते। कूप उत्सिच्यमानो हि भवेच्छुद्धो बहुदकः॥
एकजन्मसुखस्यार्थे सहस्राणि न लोपयेत्। प्राज्ञो जन्मसहस्रेषु संचिनोत्येकजन्मनि॥
मूर्खो हि न ददात्यर्थानिह दारिद्र्यशङ्कया। प्राज्ञस्तु विसृजत्यर्थानमुत्र तस्य शङ्कया॥