भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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९२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


आपको कहाँ जाना है और कहाँसे आप यहाँ पधारे हैं?'

तब मैंने भृगुजीसे कहा—महर्षे ! मैंने समुद्र-पर्यन्त सम्पूर्ण पृथ्वीपर भ्रमण किया है। मेरी यात्राका उद्देश्य था ब्राह्मणोंको भूमिदान करनेके लिये उत्तम भूमिकी खोज करना। मैं पग-पगपर ऐसी भूमिका अनुसन्धान करता था, जो सर्वथा निर्दोष, पवित्र तीर्थोंसे युक्त, रमणीय और मनोरम हो। किंतु किसी प्रकार ऐसी भूमि मुझे नहीं दिखायी देती।

भृगुजी बोले—देवर्षे ! मैंने भी ब्राह्मणोंको बसानेके लिये पूर्वकालमें समुद्रपर्यन्त सारी पृथ्वीपर भ्रमण किया था। उस समय मैंने शुभ पुण्यभूमिका दर्शन किया है। 'मही' नामसे प्रसिद्ध एक परम पवित्र नदी है, जो सर्वतीर्थमयी होनेके साथ ही परम कल्याणकारिणी है। वह देखनेमें मनोरम, सौम्य तथा महापापोंका विनाश करनेवाली है। नारद! पृथ्वीपर जो देखे हुए और बिना देखे हुए तीर्थ हैं, वे सब मही नदीके जलमें निवास करते हैं। पुण्यसलिला मही नदी समुद्रमें मिली हुई है। जहाँ मही और समुद्रका संगम हुआ है, वहाँ स्तम्भ नामक तीर्थ है, जो तीनों लोकोंमें विख्यात है। वहाँ जो मनुष्य स्नान करते हैं, वे सब पापोंसे मुक्त हो जानेके कारण यमराजके समीप नहीं जाते।

मैंने कहा—भृगुजी! आप और हम दोनों मही नदीके शोभायमान तटपर चलेंगे और साथ ही उस परम उत्तम स्थानका पूर्णरूपसे दर्शन करेंगे।

मेरी बात सुनकर भृगुजी मेरे साथ परम पुण्यमय महीतटका दर्शन करनेके लिये आये। उसे देखकर मैं बहुत प्रसन्न हुआ। मेरे सम्पूर्ण शरीरमें रोमांच हो आया और मैंने हर्ष-गद्गद वाणीमें मुनिश्रेष्ठ भृगुजीसे कहा—'ब्रह्मन् ! आपके प्रसादसे मैं इस स्थानको बहुत उत्तम बनाऊँगा। अब आप अपने आश्रमपर पधारें। मैं आगेके कार्यपर विचार करूँगा।' इस प्रकार भृगुजीको विदा करके मैं महीके तटपर विचार करने लगा कि यह स्थान मेरे अधीन कैसे होगा क्योंकि यह भूमि सदा राजाओंके अधीन रही है। यदि मैं राजा धर्मवर्माके पास जाकर इस भूमिके लिये याचना करता हूँ तो वे मेरे माँगनेपर मुझे अवश्य दे देंगे; परंतु मुनियोंने तीन प्रकारके द्रव्य बतलाये हैं—शुक्ल, शबल और कृष्ण। इनमें शुक्ल सबसे उत्तम है। शबल मध्यम श्रेणीका है और कृष्ण अधम कहलाता है। वेदोंको पढ़ाकर शिष्यसे दक्षिणारूपमें जो धन प्राप्त होता है वह शुक्ल कहा गया है। कन्यासे तथा सूद, व्यापार, खेती और याचनासे मिला हुआ धन शबल कहलाता है। जुआ, चोरी, दुःसाहसपूर्ण कार्य तथा छलसे कमाया हुआ धन कृष्ण कहा गया है। (ये शुक्ल, शबल और कृष्ण द्रव्य क्रमशः सात्त्विक, राजस और तामस माने गये हैं।) जो मनुष्य किसी उत्तम तीर्थ और पात्रको पाकर शुक्ल धनके द्वारा श्रद्धापूर्वक धर्मका अनुष्ठान करता है, वह देवयोनिमें उसके फलका उपभोग करता है। जो राजस भावसे शबल धनके द्वारा याचकोंको दान देता है, वह उसका उपभोग मनुष्य-योनिमें करता है। जो तमोगुणसे आवृत्त हो कृष्ण धनके द्वारा दान करता है, वह नराधम मृत्युके पश्चात् तिर्यग् योनिमें जाकर उसके फलका उपभोग करता है। इस दृष्टिसे मेरे याचना करनेपर मिला हुआ धन राजस होगा, यह बात स्वतः स्पष्ट है। यदि ब्राह्मणभावसे उपस्थिति हो राजासे प्रतिग्रहकी याचना करता हूँ तो वह भी प्रतिग्रह होनेके ही कारण मुझे अत्यन्त कष्टदायक प्रतीत होता है। यह राजप्रतिग्रह बड़ा भयंकर है। स्वादमें तो मधुके समान है, किंतु परिणाममें विषके तुल्य है। प्रतिग्रहयुक्त ब्राह्मण नरकमें जाता है, इसीलिये मैं इस प्रतिग्रहरूपी पापसे अलग हूँ। तब दान और याचना इन दोमेंसे किसी एक उपायके द्वारा यह स्थान अपने अधिकारमें करूँ। इसी बातपर मैं बार-बार विचार करने लगा।