संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 124, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें* माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * ९५
'राजन्! ये दानके दो हेतु बताये गये हैं। अब अधिष्ठानोंका वर्णन सुनो। दानके अधिष्ठान छः हैं। उन्हें बताता हूँ— धर्म, अर्थ, काम, लज्जा, हर्ष और भय—ये दानके छः अधिष्ठान कहे जाते हैं। सदा ही किसी प्रयोजनकी इच्छा न रखकर केवल धर्मबुद्धिसे सुपात्र व्यक्तियोंको जो दान दिया जाता है, उसे 'धर्म-दान' कहते हैं। मनमें कोई प्रयोजन रखकर ही प्रसंगवश जो कुछ दिया जाता है, उसे 'अर्थ-दान' कहते हैं। वह इस लोकमें ही फल देनेवाला होता है। स्त्रीसमागम, सुरापान, शिकार और जुएके प्रसंगमें अनधिकारी मनुष्योंको प्रयत्नपूर्वक जो कुछ दिया जाता है, वह 'काम-दान' कहलाता है। भरी सभामें याचकोंके माँगनेपर लज्जावश देनेकी प्रतिज्ञा करके उन्हें जो कुछ दिया जाता है, वह 'लज्जा-दान' माना गया है। कोई प्रिय कार्य देखकर अथवा प्रिय समाचार सुनकर हर्षोल्लाससे जो कुछ दिया जाता है, उसे धर्मविचारक महात्मा पुरुष 'हर्ष-दान' कहते हैं। निन्दा, अनर्थ और हिंसाका निवारण करनेके लिये अनुपकारी व्यक्तियोंको विवश होकर जो कुछ दिया जाता है, उसे 'भय-दान' कहते हैं।*
'इस प्रकार दानके छः अधिष्ठान बताये गये। अब उसके छः अंगोंका वर्णन सुनिये—दाता, प्रतिग्रहीता, शुद्धि, धर्मयुक्त देय वस्तु, देश और काल—ये दानके छः अंग माने गये हैं। दाता नीरोग, धर्मात्मा, देनेकी इच्छा रखनेवाला, व्यसनरहित, पवित्र तथा सदा अनिन्दनीय कर्मसे आजीविका चलानेवाला होना चाहिये। इन छः गुणोंसे दाताकी प्रशंसा होती है। सरलतासे रहित, श्रद्धाहीन, दुष्टात्मा, दुर्व्यसनी, झूठी प्रतिज्ञा करनेवाला तथा बहुत सोनेवाला दाता तमोगुणी और अधम माना गया है। जिसके कुल, विद्या और आचार तीनों उज्ज्वल हों, जीवननिर्वाहकी वृत्ति भी शुद्ध और सात्त्विक हो, जो दयालु, जितेन्द्रिय तथा योनि-दोषसे मुक्त हो, वह ब्राह्मण दानका उत्तम पात्र (प्रतिग्रहका सर्वोत्तम अधिकारी) कहा जाता है। याचकोंको देखनेपर सदा प्रसन्नमुख हो उनके प्रति हार्दिक प्रेम होना, उनका सत्कार करना तथा उनमें दोषद्रष्टि न रखना ये सब सद्गुण दानमें शुद्धिकारक माने गये हैं। जो धन किसी दूसरेको सताकर न लाया गया हो, अति क्लेश उठाये बिना अपने प्रयत्नसे उपार्जित किया गया हो, वह थोड़ा हो या अधिक, वही देने योग्य बताया गया है। किसीके साथ कोई धार्मिक उद्देश्य लेकर जो वस्तु दी जाती है, उसे धर्मयुक्त देय कहते हैं। यदि देय वस्तु उक्त विशेषताओंसे शून्य हो तो उसके दानसे कोई फल नहीं होता। जिस देश अथवा कालमें जो-जो पदार्थ दुर्लभ हो, उस-उस पदार्थका दान करनेयोग्य वही-वही देश और काल श्रेष्ठ है;
* अधिष्ठानानि वक्ष्यामि षडेव शृणु तानि च। धर्ममर्थं च कामं च व्रीडाहर्षभयानि च॥
अधिष्ठानानि दानानां षडेतानि प्रचक्षते। पात्रेभ्यो दीयते नित्यमनपेक्ष्य प्रयोजनम्॥
केवलं धर्मबुद्ध्या यद्धर्मदानं तदुच्यते। प्रयोजनमपेक्ष्यैव प्रसंगाद्यत्प्रदीयते॥
तदर्थदानमित्याहुर्हैहिकं फलहेतुकम्। स्त्रीपानमृगयाक्षाणां प्रसंगाद्यत्प्रदीयते॥
अनर्हेषु सुयत्नेन कामदानं तदुच्यते। संसदि व्रीडयाऽऽश्रुत्य अर्थोऽर्थिभ्यः प्रयाचितः॥
प्रदीयते तु तद्दानं व्रीडादानमिति श्रुतम्। दृष्ट्वा प्रियाणि श्रुत्वा वा हर्षेण यत्प्रदीयते॥
हर्षदानमिति प्राहुर्दानं तद्धर्मचिन्तकाः। आक्रोशामर्थहिंसानां प्रतीकाराय यद्भवेत्॥
दीयतेऽनुपकर्तृभ्यो भयदानं तदुच्यते।
(स्क० पु०, मा० कुमा० ३। ४२—४९)