संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * ९७
त्रिविधता है, जिसे विद्वान् पुरुष जानते हैं। गृह, मन्दिर या महल, विद्या, भूमि, गौ, कूप, प्राण और सुवर्ण— इन वस्तुओंका दान अन्य दानोंकी अपेक्षा उत्तम है। अन्न, बगीचा, वस्त्र तथा अश्व आदि वाहन— इन मध्यम श्रेणीके द्रव्योंको देनेसे यह मध्यम दान माना गया है। जूता, छाता, बर्तन, दही, मधु, आसन, दीपक, काष्ठ और पत्थर आदि— इन वस्तुओंके दानको श्रेष्ठ पुरुषोंने कनिष्ठ दान बताया है। ये दानके तीन भेद बतलाये गये। अब दाननाशके तीन हेतुओंको सुनो। जिसे देकर पीछे पश्चात्ताप किया जाय, जो अपात्रको दिया जाय तथा जो बिना श्रद्धाके अर्पण किया जाय, वह दान नष्ट हो जाता है। पश्चात्ताप, अपात्रता और अश्रद्धा— ये तीनों दानके नाशक हैं। यदि दान देकर पश्चात्ताप हो तो वह आसुर-दान है, जो निष्फल माना गया है। अश्रद्धासे जो कुछ दिया जाता है, वह राक्षस-दान है। वह भी व्यर्थ ही होता है। ब्राह्मणको डाँट-फटकारकर या उसे कटुवचन सुनाकर जो दान किया जाता है अथवा दान देकर जो ब्राह्मणको कोसा जाता है, वह पैशाच-दान माना गया है। उसे भी व्यर्थ ही समझना चाहिये। ये तीनों भाव दानके नाशक हैं।^१ राजन्! इस प्रकार सात पदोंमें बँधा हुआ जो दानका यह उत्तम माहात्म्य है, उसे मैंने तुमको बताया।
धर्मवर्मा बोले— आज मेरा जन्म सफल हुआ। आज मुझे अपनी तपस्याका फल मिल गया। यशस्वी पुरुषोंमें श्रेष्ठ महर्षि ! आज आपने मुझे कृतार्थ कर दिया। विद्या पढ़कर यदि मनुष्य दुराचारी हो गया तो उसका सम्पूर्ण जीवन व्यर्थ है। बहुत क्लेश उठाकर जो पत्नी प्राप्त की गयी, वह यदि कटुवादिनी निकली तो वह भी व्यर्थ है। कष्ट उठाकर जो कूँआँ बनवाया गया, उसका पानी यदि खारा निकला तो वह भी निरर्थक है तथा अनेक प्रकारके क्लेश सहन करनेके पश्चात् जो मनुष्यजन्म मिला, वह यदि धर्माचरणके बिना बिताया गया तो उसे भी व्यर्थ ही समझना चाहिये। इसी प्रकार मेरी तपस्या भी व्यर्थ हो गयी थी। उसे आज आपने सफल कर दिया। आपको नमस्कार है। समस्त ब्राह्मणोंको बारंबार नमस्कार है।^२ पूर्वकालमें भगवान् विष्णुने वैकुण्ठधाममें आये हुए सनकादि कुमारोंसे यह ठीक ही कहा
१- अष्टोत्तमानि चत्वारि मध्यमानि विधानतः। कनीयसानि शेषाणि त्रिविधत्वमिदं विदुः ॥
गृहप्रासादविद्याभूगोकूपप्राणहाटकम् । एतान्युत्तमादानि उत्तमान्यन्यदानतः ॥
अन्नारामौ च वासांसि हयप्रभृतिवाहनम्। दानानि मध्यमानीति मध्यमद्रव्यदानतः ॥
उपानच्छत्रपात्रादिदधिमध्वासनानि च। दीपकाष्ठोपलादीनि चरमान्याहुरुत्तमाः ॥
इति ते त्रिविधं प्रोक्तं दाननाशत्रयं शृणु।
यदत्त्वा तप्यते पश्चादपात्रेभ्यस्तथा च यत्।
अश्रद्धया च यद्दानं दाननाशास्त्रयस्त्वमी ॥
(स्क० पु०, मा० कुमा० २। ६५–६९)
यदत्त्वा तप्यते पश्चादासुरं तद्वृथा मतम्। अश्रद्धया यद्ददाति राक्षसं स्याद्वृथैव तत्॥
यच्चाक्रुश्य ददात्यङ्ग दत्त्वा वाक्रोशति द्विजम्। पैशाचं तद्वृथा दानं दाननाशास्त्रयस्त्वमी ॥
(स्क० वेंकटेश्वरकी प्रतिसे)
२- अद्य मे सफलं जन्म अद्य मे तपसः फलम्। अद्य वै कृतकृत्योऽस्मि कृतः कीर्तिमतां वर॥
पठित्वा सकलं जन्म दुराचारस्य नुर्वृथा। बहुक्लेशाच्च लब्धा स्त्री सा वृथाप्रियवादिनी ॥
क्लेशेन कृत्वा कूपं वा स च क्षारोदको वृथा। बहुक्लेशैरर्जन्म नीत्वा विना धर्मे वृथा यथा॥
एवं मे यद् वृथा जातं तपस्तत्सफलं त्वया। कृतं तस्मान्नमस्तुभ्यं द्विजेभ्यश्च नमो नमः॥
(स्क० पु०, मा० कुमा० ३। १७१–१७४)