संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 128, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * ९९
प्रतिग्रहसे डरना चाहिये। मूर्ख ब्राह्मण थोड़ा प्रतिग्रह लेकर भी कीचड़में फँसी हुई गायकी भाँति कष्ट पाता है। इसलिये जो मूढ़ तपस्यासे युक्त और गुप्तरूपसे स्वाध्यायका साधन करनेवाले हैं तथा जो शान्त चित्तवाले हैं, उन्हींको दिया हुआ दान सदा अक्षय होता है। उत्तम देशमें (काशी आदि तीर्थोंमें), उत्तम काल (ग्रहण आदि)-में श्रेष्ठ उपायसे सत्पात्रको श्रद्धापूर्वक जो द्रव्य दिया जाता है, वही परिपूर्ण दान-धर्मका लक्षण है। केवल विद्या अथवा तपस्यासे सुपात्रता नहीं आती। जहाँ सदाचार है और उसके साथ ये दोनों (विद्या और तपस्या) भी हैं, उसीको उत्तम पात्र कहा जाता है।
कलाप-ग्रामनिवासी सुतनुद्वारा नारदजीके जटिल प्रश्नोंका समाधान
**नारदजी कहते हैं—**अर्जुन! मैं देश-देश घूमकर विद्यारूपी नेत्रवाले ब्राह्मणोंकी परीक्षा करता हूँ। यदि वे मेरे प्रश्नोंका उत्तर दे देंगे, तब मैं उन्हें दान करूँगा। ऐसा विचार करके मैं उस स्थानसे उठा और महर्षियोंके आश्रमोंपर इन प्रश्नरूपी श्लोकोंका गान करता हुआ विचरण करने लगा। वे श्लोक इस प्रकार हैं, सुनो—
मातृकां को विजानाति कतिधा कीदृशाक्षराम्।
पञ्चपञ्चाद्भुतं गेहं को विजानाति वा द्विजः॥
बहुरूपां स्त्रियं कर्तुमेकरूपां च वेत्ति कः।
को वा चित्रकथं बन्धं वेत्ति संसारगोचरः॥
को वार्णवमहाग्राहं वेत्ति विद्यापरायणः।
को वाष्टविधं ब्राह्मण्यं वेत्ति ब्राह्मणसत्तमः॥
युगानां च चतुर्णां वा को मूलदिवसान् वदेत्।
चतुर्दशमनूनां वा मूलवारं च वेत्ति कः॥
कस्मिंश्चैव दिने प्राप पूर्वं वा भास्करो रथम्।
उद्वेजयति भूतानि कृष्णाहिरिव वेत्ति कः॥
को वास्मिन् घोरसंसारे दक्षदक्षतमो भवेत्।
पन्थानावपि द्वौ कश्चिद्वेत्ति वक्ति च ब्राह्मणः॥
इति मे द्वादश प्रश्नान् ये विदुर्ब्राह्मणोत्तमाः।
ते मे पूज्यतमास्तेषामहमाराधकश्चिरम्॥
(स्क० पु० मा० कुमा० ३।२०५-२१२)
(१) मातृकाको कौन विशेषरूपसे जानता है? वह मातृका कितने प्रकारकी और कैसे अक्षरोंवाली है? (२) कौन द्विज पचीस वस्तुओंके बने हुए गृहको अच्छी तरह जानता है? (३) अनेक रूपवाली स्त्रीको एक रूपवाली बनानेकी कला किसको ज्ञात है? (४) संसारमें रहनेवाला कौन पुरुष विचित्र कथावाली वाक्य-रचनाको जानता है? (५) कौन स्वाध्यायशील ब्राह्मण समुद्रमें रहनेवाले महान् ग्राहकी जानकारी रखता है? (६) किस श्रेष्ठ ब्राह्मणको आठ प्रकारके ब्राह्मणत्वका ज्ञान है? (७) चारों युगोंके मूल दिनोंको कौन बता सकता है? (८) चौदह मनुओंके मूल दिवसका किसको ज्ञान है? (९) भगवान् सूर्य किस दिन पहले-पहल रथपर सवार हुए? (१०) जो काले सर्पकी भाँति सब प्राणियोंको उद्वेगमें डाले रहता है, उसे कौन जानता है? (११) इस भयंकर संसारमें कौन दक्ष मनुष्योंसे भी अत्यधिक दक्ष माना गया है? (१२) कौन ब्राह्मण दोनों मार्गोंको जानता और बतलाता है? जो श्रेष्ठ ब्राह्मण मेरे इन बारह प्रश्नोंको जानते हैं, वे मेरे लिये परमपूज्य हैं और मैं उनका चिरकालतक सेवक बना रहूँगा।
अर्जुन! इन प्रश्नोंका गान करता हुआ मैं सारी पृथ्वीपर घूमता रहा। मुझे जो-जो ब्राह्मण मिले, उन सबने यही कहा—'आपके इन प्रश्नोंकी व्याख्या बहुत कठिन है। हम तो केवल नमस्कार करते हैं।' इस प्रकार सारी पृथ्वीपर घूमकर मैं लौट आया और हिमालयके शिखरपर बैठकर पुनः इस प्रकार विचार करने लगा। 'अहो! मैंने सब ब्राह्मणोंको देख लिया, अब क्या करूँ?'