संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* प्रभासखण्ड * १२८७
वेदकी निन्दा करनेवाला—ये सभी ब्राह्मण श्राद्धमें त्याग देनेयोग्य हैं। जलके प्रवाहको छिन्न-भिन्न करनेवाला अथवा उसे रोकनेवाला, दूतकर्म करनेवाला, वृक्षारोपणकी वृत्तिसे जीनेवाला, कुत्तेसे शिकार खेलनेवाला, बाज पक्षीसे जीविका चलानेवाला, कुमारी कन्याको कलंकित करनेवाला, हिंसक, शूद्रवृत्तिसे जीनेवाला, आचारहीन, बहुत बड़े जनसमुदायकी पुरोहिती करनेवाला, प्रतिदिन भीख माँगनेवाला तथा मुर्दे ढोनेवाला—ऐसे ब्राह्मण यत्नपूर्वक त्याज्य हैं। जिनका आचरण निन्दित हो, वे अधम द्विज श्रेष्ठ ब्राह्मणोंकी पंक्तिमें बैठनेके अधिकारी नहीं हैं; अतः विद्वान् ब्राह्मण देवकार्य और पितृकार्य दोनोंमें पूर्वोक्त ब्राह्मणोंको सम्मिलित न करे।
प्रत्येक मासमें अमावास्या आनेपर श्राद्ध करना चाहिये। अष्टका तिथि, सूर्यग्रहण, चन्द्रग्रहण, विषुवयोग, अयनारम्भके दिन तथा सामान्यतः सूर्यकी प्रत्येक संक्रान्तिके दिन श्राद्ध करना चाहिये। कृष्णपक्षमें आर्द्रा, मघा, रोहिणी आदि नक्षत्रोंमें श्राद्धके योग्य द्रव्य और ब्राह्मणका संयोग प्राप्त होनेपर तथा गजच्छाया, व्यतीपात, भद्रा और वैधृतियोगमें भी श्राद्ध करना चाहिये। वैशाखकी तृतीया, कार्तिक शुक्ला नवमी, माघकी पूर्णिमा और भाद्रपद कृष्णा त्रयोदशी—ये युगादि तिथियाँ मानी गयी हैं। माघमासकी सप्तमीको भगवान् सूर्य पहले-पहल रथपर आरूढ़ हुए, इसलिये उसे 'रथ-सप्तमी' कहते हैं। आश्विन शुक्ला नवमी, कार्तिककी द्वादशी, चैत्र और भादोंकी तृतीया, फाल्गुनकी अमावास्या, पौषकी एकादशी, आषाढ़की दशमी, माघकी सप्तमी, श्रावणकी कृष्णाष्टमी, आषाढ़, कार्तिक, फाल्गुन, चैत्र और ज्येष्ठकी पूर्णिमाएँ—ये मन्वन्तरकी आदि तिथियाँ हैं जो दानके पुण्यको अक्षय करनेवाली हैं। मन्वन्तरादि तिथिमें बारह प्रकारके श्राद्ध करने चाहिये—नित्य, नैमित्तिक, काम्य, वृद्धिश्राद्ध, सपिण्डन-श्राद्ध, पार्वण-श्राद्ध, गोष्ठ-श्राद्ध, शुद्धि-श्राद्ध, कर्मांग-श्राद्ध, दैविकश्राद्ध, क्षयाह-श्राद्ध और तुष्टि-श्राद्ध। इन सबमें सांवत्सरिक (क्षयाह) श्राद्ध श्रेष्ठ माना गया है। प्रतिदिन किये जानेवाले श्राद्धको 'नित्य-श्राद्ध' कहते हैं। उसमें विश्वेदेवकी पूजा नहीं की जाती। यदि अन्नसे श्राद्ध करनेकी शक्ति न हो तो केवल जलसे भी नित्यश्राद्ध किया जाता है। एकोद्दिष्ट श्राद्धका नाम नैमित्तिक श्राद्ध है। अभीष्ट वस्तुकी सिद्धिके लिये कामना रखकर जो श्राद्ध किया जाता है, उसे काम्य-श्राद्ध कहते हैं। विवाह आदि उत्सवोंके अवसरपर जो श्राद्ध किया जाता है, वह वृद्धि-श्राद्ध कहलाता है। 'ये समाना०'—इत्यादि दो मन्त्रोंके द्वारा किये जानेवाले श्राद्धको 'सपिण्डन' कहते हैं। अमावास्या आदि पर्वोंपर किये जानेवाले श्राद्धको 'पार्वण' कहते हैं। गोशालामें जो श्राद्ध किया जाता है, वह गोष्ठश्राद्ध है। पापशुद्धिके लिये जो श्राद्ध किया जाता है, उसे 'शुद्धि' श्राद्ध कहते हैं। गर्भाधान, सोमयाग, सीमन्तोन्नयन तथा पुंसवन आदिमें जो श्राद्ध किया जाता है, वह कर्मांग-श्राद्ध है। देवताके उद्देश्यसे किये जानेवाले श्राद्धको 'दैविक श्राद्ध' कहते हैं। जो देशान्तरमें चला जाय, उसकी तुष्टिके लिये घीसे श्राद्ध करना चाहिये। इसे तुष्टि-श्राद्ध कहते हैं। बारह महीनेपर जो श्राद्ध किया जाता है, उसे क्षयाह अथवा सांवत्सरिक श्राद्ध कहते हैं। जो वर्षके अन्तमें क्षयाहके दिन पिता और माताका आदरपूर्वक श्राद्ध नहीं करते, उनकी की हुई पूजाको मैं नहीं ग्रहण करता। जो मनुष्य पिताकी क्षयाह-तिथिको ठीक-ठीक नहीं जानता हो, उसे माघ अथवा मार्गशीर्षकी अमावास्याको सांवत्सरिक श्राद्ध करना चाहिये।
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