संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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पर्व (दर्श-पौर्णमास) तथा आग्रयण आदि कार्य मलमासमें भी करने योग्य हैं। अग्न्याधान, प्रतिष्ठा, यज्ञ, दान, व्रत, वेद-व्रत, वृषोत्सर्ग, चूडाकर्म तथा मांगलिक अभिषेक भी मलमासमें न करे। नित्य-नैमित्तिक कर्मोंको मलमासमें यत्नपूर्वक करना चाहिये। इसी प्रकार तीर्थस्नान, गजच्छाया-स्नान और प्रेतश्राद्ध भी मलमासमें अवश्य करने योग्य है। जहाँ भोजन करनेवाले भाई-बन्धु और सगोत्र पुरुष नहीं उपलब्ध होते और अन्त्यज आदिसे श्राद्धभूमि घिर जाती है, वहाँ यह सब राक्षसी श्राद्धका लक्षण है। जो स्वयं श्राद्ध करके दूसरेके श्राद्धमें विह्वल होकर भोजन करता है, उसके पितर पिण्ड और तर्पणके लुप्त हो जानेसे नरकमें गिरते हैं।१
यज्ञ और श्राद्धके लिये न्यायपूर्वक ब्राह्मणको निमन्त्रण देकर जो किसी प्रकार उसे छोड़ देता है, वह पापात्मा शूकर-योनिको प्राप्त होता है। दैवश्राद्ध अथवा पितृश्राद्धमें जब अशौच हो जाय, तब उसकी निवृत्ति होनेपर ब्राह्मणोंको श्राद्धका दान देना चाहिये। श्राद्धकी समाप्ति होनेपर ब्राह्मणोंसे आशीर्वाद लेना चाहिये, इससे दीर्घायुकी प्राप्ति होती है। पहले ब्राह्मणके हाथमें जल देकर इस प्रकार प्रार्थना करे—
अपां मध्ये स्थिता देवाः सर्वमप्सु प्रतिष्ठितम्।
ब्राह्मणस्य करे न्यस्ताः शिवा आपो भवन्तु नः ॥
'देवता जलके भीतर निवास करते हैं। सब कुछ जलमें ही प्रतिष्ठित है। ब्राह्मणके हाथमें रखा हुआ जल हमारे लिये कल्याणकारी हो।'
तत्पश्चात् ब्राह्मणके हाथमें फूल देकर इस प्रकार प्रार्थना करे—
लक्ष्मीर्वसति पुष्पेषु लक्ष्मीर्वसति पुष्करे।
लक्ष्मीर्वसति वै सोमे सौमनस्यं सदास्तु मे ॥
'लक्ष्मी फूलोंमें निवास करती हैं। लक्ष्मी कमलमें निवास करती हैं और लक्ष्मी चन्द्रमामें वास करती हैं। मेरा मन सदा प्रसन्न रहे।'
तदनन्तर ब्राह्मणके हाथमें अक्षत देकर प्रार्थना करे—
अक्षतं चास्तु मे पुण्यं शान्तिः पुष्टिर्धृतिश्च मे।
यद्यच्छ्रेयस्करं लोके तत्तदस्तु सदा मम॥
'मेरा पुण्य अक्षय हो; मुझे शान्ति, पुष्टि और धृति प्राप्त हो। लोकमें जो कल्याणकारी वस्तुएँ हैं, वे सदा मुझे मिलती रहें।'
इसके बाद ब्राह्मणको दक्षिणा देकर प्रार्थना करे—
दक्षिणाः पान्तु सर्वत्र बहुदेयं तथास्तु नः।
'दक्षिणा सर्वत्र रक्षा करे और हमारे पास दान करनेके लिये बहुत सामग्री हो।'
सभी प्रार्थनाओंके उत्तरमें ब्राह्मण 'एवमस्तु' कहकर उनका अनुमोदन करे और यजमान मस्तक झुकाकर ब्राह्मणके आशीर्वादको शिरोधार्य करे। भोगकी इच्छा रखनेवाला पुरुष पिण्डको सदा अग्निमें डाले। सन्तानकी प्राप्तिके लिये मध्यम पिण्ड मन्त्रोच्चारणपूर्वक पत्नीको दे दे। उत्तम कान्ति चाहे तो सदा गौओंको ही पिण्ड खिला दे। यदि प्रज्ञा, यश और कीर्तिकी अभिलाषा हो तो सदा पिण्डको जलमें ही डाल दे। दीर्घ आयुकी चाह हो तो सब पिण्ड कौओंको खिला दे। कार्तिकेयजीके लोकमें जानेकी अभिलाषा हो तो मुर्गेको खिलाये अथवा दक्षिण दिशाकी ओर मुख करके सब पिण्ड आकाशमें ही फेंक दे। क्योंकि आकाश और दक्षिण दिशा पितरोंके स्थान हैं।२
चन्द्रग्रहणके सिवा और कभी रात्रिमें श्राद्ध न करे। चन्द्रग्रहणका दर्शन होनेपर शीघ्र सर्वस्व
१- श्राद्धं कृत्वा परश्राद्धे यस्तु भुङ्क्ते स विह्वलः। पतन्ति पितरस्तस्य लुप्तपिण्डोदकक्रियाः ॥
(स्क० पु०, प्र० ख० २००। ६३-६४)
२- पिण्डमग्नौ सदा दद्याद्भोगार्थी सततं नरः। प्रजार्थं पत्न्यै वै दद्यान्मध्यमं मन्त्रपूर्वकम् ॥
उत्तमां द्युतिमन्विच्छेदगोषु नित्यं प्रदापयेत्। प्रज्ञामिच्छेद्यशः कीर्तिमप्सु नित्यञ्च प्रक्षिपेत् ॥