संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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करनेवाला है। कश्यपेश्वरका दर्शन करके मनुष्य धनवान् और पुत्रवान् होता है तथा सब पातकोंसे मुक्त हो जाता है।
कश्यपेश्वरसे ईशानकोणमें आठ धनुष दूर कौशिकेश्वर शिव हैं, जो बड़े-बड़े पातकोंका नाश करनेवाले हैं। उनका दर्शन-पूजन करके मानव मनोवांछित फल पाता है।
मार्कण्डेयेश्वरसे बीस धनुष दक्षिण ओर कुमार कार्तिकेयद्वारा स्थापित लिंग है। उसके आगे एक कूप है। उसमें स्नान करके जो कुमारेश्वर शिवका पूजन करता है, वह सब पातकोंसे मुक्त होकर स्वामी कार्तिकेयजीके लोकमें जाता है।
मार्कण्डेयेश्वरसे उत्तर दिशामें पंद्रह धनुष दूर गौतमेश्वर नामक उत्तम लिंग है। उस लिंगकी विधिपूर्वक पूजा करके मनुष्य पाँच पातकोंसे छूट जाता है।
वहाँसे पश्चिम भागमें सोलह धनुषपर देवराजेश्वर लिंग है, जिसकी स्थापना देवराज इन्द्रने की है। जो मनुष्य उनकी पूजा करता है, वह सब पातकोंसे मुक्त हो जाता है। वहींपर मनुजीके द्वारा स्थापित मानवेश्वर लिंग है। जो उसकी पूजा करता है, वह पातकोंसे मुक्त होता है। सब लोक शिवममय हैं और सब कुछ शिवमें ही प्रतिष्ठित है। इसलिये जो अपना कल्याण चाहे वह भगवान् शिवके ही नामोंका जप करे। ब्रह्मा आदि सब देवता, राजा, महर्षि, मनुष्य और मुनि—ये सभी लोग शिवलिंगका पूजन करते हैं। शिवलिंगकी स्थापना करनेवाला मानव ब्रह्महत्या, बालहत्या तथा अन्य पातकोंका शिवजीके तेजसे नाश करता है।
वहाँसे दक्षिण दिशामें वृषध्वजेश्वर नामक शिव हैं। वे ही अव्यक्त अविनाशी अक्षर ब्रह्म हैं, जिससे परे कुछ भी नहीं है। उनका न आदि है, न अन्त है। वे योगिगम्य हैं। सर्वाश्चर्यमय हैं। बुद्धिसे ग्रहण करनेयोग्य तथा निरामय हैं। उनके सब ओर हाथ, पैर, नेत्र, सिर और मुख हैं। उन्हींको मृड और स्थाणु आदि नामोंसे पुकारते हैं। राजा मरुत्त, पृथु, भरत, शशविन्दु, गय, शिबि, राम, अम्बरीष, मान्धाता, दिलीप, भगीरथ, सुहोत्र, रन्तिदेव, ययाति और सगर—ये भाग्यशाली राजा प्रभासक्षेत्रमें आये और वृषध्वजेश्वरकी यज्ञोंद्वारा आराधना करके स्वर्गलोकमें चले गये। देवि! मैं सच कहता हूँ, हितकी बात कहता हूँ और बार-बार इसको दुहराता हूँ—इस विनाशशील असार संसारमें केवल शिवकी आराधना ही सार है। जिसने भगवान् शिवका दर्शन किया है, वह धन्य है।
गौतम और प्रेतका संवाद, प्रेतोंका उद्धार तथा प्रेततीर्थकी उत्पत्ति
महादेवजी कहते हैं—पूर्वकालकी बात है, उत्तम व्रतका पालन करनेवाले महर्षि गौतम भृगुकच्छसे प्रभासक्षेत्रमें आये। वे परम पवित्र उत्तरायणमें श्रीसोमनाथजीका दर्शन करनेकी इच्छासे वहाँ पधारे थे। सोमेश्वरका दर्शन तथा सम्पूर्ण तीर्थोंमें स्नान करके गौतमजी प्रभासमें ही तीर्थभ्रमण करने लगे। घूमते-घूमते गात्रच्छेद तीर्थमें गये। उसकी सीमापर पहुँचते ही उन्हें वैष्णव वन दिखायी दिया, जो भगवान् विष्णुको बहुत ही प्रिय है। उस वनमें सौ धनुषतक फैला हुआ पुरुषोत्तम क्षेत्र है। वहाँ सीमापर पहुँचकर उन्होंने महाभयंकर विशालकाय पाँच प्रेतोंको देखा, जो बड़े-बड़े वृक्षोंपर बैठे हुए थे। उनके केश ऊपरकी ओर उठे हुए थे। उन प्रेतोंको देखकर वे भयसे थर्रा उठे। फिर भी धैर्य धारण करके देरतक कुछ सोच-विचारकर उन्होंने पूछा—'अहो! यह विकराल देह धारण करनेवाले तुमलोग कौन हो?'