संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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विश्वासघाती, ब्रह्महत्यारा, स्त्री-वध करनेवाला, गोघाती, गुरुघाती और पितृहत्या करनेवाला है, वह मनुष्य भी प्रेत होता है। मरनेपर जिसके लिये सोलह एकोद्दिष्ट नहीं किये गये हैं, उसको भी प्रेतयोनिकी प्राप्ति होती है।
गौतमने पूछा—किस कर्मके परिणामसे मनुष्य प्रेतयोनिमें नहीं पड़ता, वह सब मुझसे कहो।
प्रेतोंने कहा—जो तीर्थयात्रामें तत्पर, देवपूजा-परायण तथा सदा ब्राह्मण-भक्त रहता है, वह प्रेत नहीं होता। जो प्रतिदिन शास्त्र सुनता, नित्य पण्डितोंकी सेवा करता और वृद्ध पुरुषोंसे अपना सन्देह पूछता है, वह प्रेत नहीं होता। जो पवित्र गयातीर्थमें जाकर श्राद्ध करता है, उसके वंशमें कोई प्रेत नहीं होता। इसीलिये हम बड़ी दूरसे यहाँ शीघ्रतापूर्वक आये हैं, परंतु इस पुण्यक्षेत्रमें प्रवेश नहीं कर पाते। इस प्रेतशरीरसे हमारा मन खिन्न हो गया है। अतः महाभाग! आप ही प्रयत्नपूर्वक हमलोगोंके आश्रय होइये।
गौतमने पूछा—तुम्हारा उद्धार किस प्रकार होगा?
प्रेत बोले—प्रभो! आप वैष्णव-क्षेत्रमें जाकर हमारे नाम और गोत्रका उच्चारण करके श्राद्ध कीजिये। इससे हमारी मुक्ति हो जायगी।
यह सुनकर दयार्द्र गौतमने वैष्णव-क्षेत्रमें जाकर उन सबोंके लिये पृथक्-पृथक् श्राद्ध किया। वे जिस-जिसका श्राद्ध करते थे, वह-वह रात्रिको स्वप्नमें आकर दर्शन देता और कहता—'विप्रवर! आपके प्रसादसे मैं प्रेतयोनिसे मुक्त हो गया। आपका कल्याण हो, अब मैं जाता हूँ। मेरे लिये विमान उपस्थित हुआ है।' यों कहकर प्रत्येक प्रेत चल देता था। इस प्रकार उन्होंने चार प्रेतोंका तो उद्धार कर दिया। पाँचवें दिन उन्होंने पर्युषितके लिये विधिपूर्वक श्राद्ध किया। तदनन्तर रातको स्वप्नमें उन्हें पर्युषित दिखायी दिया, जो लंबी-लंबी साँसें खींचता हुआ दीनतापूर्ण वाणीमें बोल रहा था—'विप्रवर! मुझ भाग्यहीन पापीका उद्धार नहीं हुआ। मेरे द्वारा यही सबसे बड़ा पाप हुआ कि मैंने धन बढ़ाया।'
गौतमने पूछा—प्रेत! तुम्हारा उद्धार अब किस प्रकार होगा? अब शीघ्र बताओ।
पर्युषित बोला—ब्रह्मन्! आप मेरा पुनः श्राद्ध कीजिये।
उसके यों कहनेपर गौतमने उसके लिये उत्तरायणमें पुनः श्राद्ध किया। तदनन्तर रातको स्वप्नमें उसने आकर दर्शन दिया और कहा—'विप्रवर! मैं आपके प्रसादसे प्रेत-योनिसे छूट गया। आपका कल्याण हो, मैं जाता हूँ। मुझे देवत्व प्राप्त हुआ है, अतः मुझमें वर देनेकी शक्ति आ गयी है; इसलिये मुझसे कोई शुभ वर ग्रहण कीजिये। क्योंकि ब्रह्महत्यारे, शराबी, चोर तथा व्रतभंग करनेवाले पुरुषोंके लिये साधु पुरुषोंने प्रायश्चित्त बताया है; किंतु कृतघ्नके लिये कोई भी प्रायश्चित्त नहीं बतलाया गया है।'
गौतमने कहा—यदि तुम मुझे वर देनेमें समर्थ हो तो जिस स्थानमें मैंने तुम सब प्रेतोंको देखा है, वहाँ मैं आश्रम बनाकर तपस्या करूँगा। वहाँ जो मनुष्य भक्तिपूर्वक स्नान और देवताओंका तर्पण करके पितरोंके उद्देश्यसे विधिवत् श्राद्ध करे, वह आपके प्रसादसे कभी प्रेत-योनिमें न आये। उसके वंशमें भी कभी कोई प्रेत न हो।
पर्युषित बोला—विप्रवर! तुम वहाँ जाकर आश्रम बनाओ। इससे तुम्हें उत्तम सिद्धि प्राप्त होगी। जो मानव श्रद्धा-भक्तिसे यहाँ श्राद्ध करेंगे, वे पितरोंसहित विमानमें बैठकर स्वर्गको जायँगे। उनमेंसे कोई प्रेत नहीं होगा। स्थिरबुद्धिवाले विद्वानोंने मैत्रीको सात पदवाली बताया है। तुम्हारा यह पवित्र आश्रम सब पापोंका नाशक और समस्त दुःखोंका निवारक होगा। यह स्थान मेरे नामपर प्रेततीर्थ कहलाये।
'एवमस्तु' कहकर गौतमजी चले गये। तदनन्तर वेदोक्त मार्गसे उन्होंने सब कार्य सम्पन्न किया।
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