भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 1330, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 1330

* प्रभासखण्ड * १३०१

वहाँ प्रकट हुईं तथा कालदण्डधारी यमराज भी भगवान् सूर्यके निकट उपस्थित हुए।

सूर्यदेव बोले—धर्म! तुम और यमुना कोटि तीर्थोंके साथ यहाँ निवास करो। तुम्हें यहाँ रहकर पापी प्राणियोंकी भी यत्नपूर्वक रक्षा करनी चाहिये।

यों कहकर श्रीसूर्यदेव अन्तर्धान हो गये। दुर्वासाजीने अपने आश्रमकी ओर दृष्टिपात किया तो देखा, वहाँ पातालसे यमुना प्रकट हो गयीं और उस क्षेत्रमें साक्षात् यमराज भी स्वरूप धारण करके दृष्टिगोचर हुए। आदित्यसे दक्षिण और दुन्दुभिसे पूर्वभागमें यमुनाकुण्ड है। दुन्दुभि वहाँके क्षेत्रपाल हैं, जिनका शब्द दुन्दुभि-ध्वनिके समान होता है। वैशाखमासमें उस कुण्डमें स्नान करके मनुष्य भक्तिभावसे दुर्वासादित्यकी पूजा करे। जो उस महाकुण्डमें स्नान करके पितरोंका तर्पण करता है, उसके पितर दस वर्षतक तृप्त रहते हैं। वहाँ पिण्ड देनेसे पितरोंकी एक सौ आठ पीढ़ियाँ पुष्ट होती हैं, साथ ही नरकमें गिरे हुए पितरोंका तत्काल उद्धार हो जाता है। माघमासके शुक्लपक्षमें सप्तमी तिथिको जो मानव अपने मनको संयममें रखते हुए दुर्वासादित्यकी पूजा करता है, वह ब्रह्महत्यासे छूट जाता है। जो वहाँ दुर्वासादित्यके समीप सहस्र नामोंका पाठ करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। दुर्वासादित्यका दर्शन सब बालकोंपर लगे हुए ग्रहों और राक्षसोंका निवारण तथा महान् पापपुंजोंका शमन करनेवाला है। जो वहाँ क्षेत्रपाल दुन्दुभिका पूजन करता है, वह पशु-सम्पत्ति, पुत्र, बुद्धि तथा लक्ष्मीसे सम्पन्न होता है। सूर्यदेवका वह क्षेत्र एक कोसतक फैला हुआ है। जो सूर्यदेवके प्रति भक्तिभावसे रहित है, उसे उस क्षेत्रमें नहीं प्रवेश करना चाहिये।

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नागरादित्य, पिंगा नदी, संगमेश्वर तथा गंगेश्वरकी महिमा

महादेवजी कहते हैं—समस्त यादवोंका संहार हो जानेपर केवल वज्र शेष रह गये थे। वे अपनी आयुके शेष भागमें अपने पुत्र महद्वलक यादवोंके राज्यपर अभिषिक्त करके प्रभासक्षेत्रमें आये। यहाँ उन्होंने एक शिवलिंग स्थापित किया, जो व्रजेश्वर नामसे प्रसिद्ध हुआ। राजा वज्रने नारदजीके उपदेशसे दीर्घकालतक पापनाशक प्रभासक्षेत्रमें तपस्या की और परम सिद्धिको प्राप्त किया। जो मनुष्य जाम्बवतीके जलमें स्नान करके व्रजेश्वरकी पूजा करता और वहाँ यादवस्थलके समीप ब्राह्मणोंको भोजन कराता है, वह सहस्र गोदानोंका फल पाता है।

हिरण्याके समीप नागरादित्यका स्थान है। नागरादित्य सब पापोंका नाश करनेवाले हैं। द्वारकामें निघ्नके पुत्र सत्राजित् हो गये हैं। उन्होंने यहाँ भगवान् सूर्यकी आराधना की और भगवान्ने संतुष्ट होकर उन्हें स्यमन्तकमणि प्रदान की, जो प्रतिदिन आठ भार सोना देती थी। उसे देकर भगवान् भानुने पुनः सत्राजित्को वर माँगनेके लिये प्रेरित किया। तब सत्राजित्ने कहा—'प्रभो! आप इस पुण्य आश्रममें सदा निवास करें।' 'एवमस्तु' कहकर सूर्यदेव अन्तर्धान हो गये। सत्राजित्ने वहाँ सूर्यदेवकी दिव्य प्रतिमा स्थापित की और प्रभास नगरके ब्राह्मणोंको वृत्ति देकर उन्हें सेवा-पूजाका भार समर्पित किया। अतः नागर ब्राह्मणोंके नामपर ही उसका नाम नागरादित्य हुआ। जो हिरण्या नदीके जलमें स्नान करके नागरादित्यका पूजन करता है, वह सूर्यलोकमें पूजित होता है। जब शुक्लपक्षकी सप्तमीको सूर्यकी संक्रान्ति हो, तब उसे महाजया सप्तमी कहते हैं। उसमें किये हुए स्नान, दान, जप, होम तथा देवताओं और पितरोंका पूजन—ये सभी कोटिगुना फल देनेवाले होते हैं। जो उस समय नागरादित्यके समीप एक ब्राह्मणको भोजन

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